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भाषाओं का सम्मान

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देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद के उच्च सदन में जनता के नुमाइंदे अपनी भाषा में अपनी बात कह सकेंगे. संविधान की आठवीं अनुसूची में कुल 22 भाषाएं शामिल हैं. मॉनसून सत्र में राज्यसभा के सदस्य इनमें से किसी भी भाषा का प्रयोग कर सकेंगे.

इसके लिए सदन में विशेष प्रशिक्षित दुभाषियों की नियुक्ति की गयी है. अभी तक हिंदी, उर्दू, बांग्ला, ओड़िया, असमी समेत कुल 12 भाषाओं में दुभाषियों की व्यवस्था थी. अब इस सूची में डोगरी, कश्मीरी, कोंकणी, संथाली तथा सिंधी भाषा के दुभाषिये भी होंगे. बोडो, मैथिली, मणिपुरी, मराठी तथा नेपाली के लिए लोकसभा के दुभाषियों की सेवा ली जायेगी. सार्थक बहस के लिहाज से यह सुविधा अहम होने के साथ भारतीय संघवाद की परिकल्पना के अनुकूल भी है.

हमारा संघवाद भाषाओं की बहुलता का हिमायती है और इसी नाते सैद्धांतिक तौर पर यह माना जाता रहा है कि देश की भाषाएं समान हैं. संविधान के अनुच्छेद 120 में कहा गया है कि वैसे तो सदन की कार्यवाही हिंदी या अंग्रेजी में चलेगी, पर कोई सदस्य अध्यक्ष की अनुमति से अपनी मातृभाषा में अपना पक्ष रख सकता है. नियम यह है कि हिंदी या अंग्रेजी से अलग किसी अन्य भाषा में सदस्य बात रखना चाहते हैं, तो उन्हें कार्यवाही से यथासंभव पहले सूचित करना होगा, ताकि संसाधन मुहैया कराया जा सके.

राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने कहा है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में संसद भी बहुभाषी ही होगी और ऐसे में सदन के किसी भी सदस्य को यह नहीं लगना चाहिए कि सिर्फ भाषाई बाधा के कारण वह किसी अन्य सदस्य से कमतर है या फिर अपनी बात ठीक तरीके से नहीं कह पा रहा है. अब सदस्य एक-दूसरे के विचारों को अधिक गहराई और गंभीरता से सुन-समझ सकेंगे तथा सदस्यों की राय और योगदान को लोग भी बेहतर तरीके से जान सकेंगे.

अनुसूचित भाषाओं में सांसद अपनी बात सुभीते से कह सकें, इसका इंतजाम करना निश्चित ही एक सराहनीय कदम है. लेकिन, मामला इतने भर तक सीमित नहीं रहना चाहिए. जनहित के मुद्दे पर होनेवाली बहस में अपनी भाषा में अभिव्यक्ति जितनी आवश्यक है, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि किसी और भाषा में कही गयी बात को अपनी भाषा में समझा जाये.

इसे सुनिश्चित करने में दुभाषिये एक हद तक ही मददगार हो सकते हैं. इसके लिए भाषाओं की एक विशेष राजनीतिक संस्कृति को भी गढ़ा जाना चाहिए, जो विविधतापूर्ण भारत के लिए बहुभाषी जनप्रतिनिधि गढ़ सके. अगर संविधान सभा के दौर से आज के समय की तुलना करें, तो जान पड़ेगा कि बहुभाषी सांसदों-विधायकों की संख्या में कमी आयी है.

यह तथ्य इंगित करता है कि कहीं-न-कहीं हम अपनी बहुभाषिकता को खो रहे हैं. इस लिहाज से राज्यसभा की इस नयी व्यवस्था के इरादे के दायरे को विस्तार देते हुए उसे देशव्यापी सांस्कृतिक अभियान में बदलने की जरूरत है.

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