[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Opinion इंजीनियरिंग का संकट

इंजीनियरिंग का संकट

0
सरकार ने दिल्ली के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) से तकनीकी शिक्षा के बारे में एक व्यापक कार्ययोजना तैयार करने को कहा है. इस मोर्चे पर सुधार के लिए यह एक जरूरी पहल है. फिलहाल शैक्षणिक संस्थानों में कई कारणों से सीटें खाली रह जा रही हैं और कैंपस सेलेक्शन के अवसर भी कम हुए हैं. युवाओं की बड़ी संख्या भारत में है.
हमारी आबादी में 35 साल से कम उम्र के लोगों की तादाद करीब 65 फीसदी है और 50 फीसदी के आसपास 25 साल या इससे कम उम्र के लोग हैं. इस आधार पर अक्सर जनांकिक बढ़त (डेमोग्राफिक डिविडेंड) की बात कही जाती है. तरक्की के लिहाज से यह तादाद निश्चित तौर पर मददगार हो सकती है, बशर्ते अर्थव्यवस्था की जरूरत और मांग के हिसाब से इसे हुनरमंद बनने के मौके हासिल हों.
इस संबंध में चिंताजनक तथ्य यह है कि इंजीनियरिंग, फार्मेसी, कंप्यूटर, आर्किटेक्चर, शहरी नियोजन तथा होटल प्रबंधन जैसे रोजगारोन्मुखी शिक्षा के संस्थान दाखिले, पाठ्यक्रम, आधारभूत सुविधा से जुड़ी कई मुश्किलों से जूझ रहे हैं और उनमें दाखिला कम हो रहा है. इंजीनियरिंग संस्थानों की हालत ज्यादा खराब है. देश में तकनीकी शिक्षा की सबसे ज्यादा (कुल सीटों का 70 फीसदी) सीटें इंजीनियरिंग में हैं. लेकिन बीई/बीटेक की लगभग 15.5 लाख सीटों में 51 फीसदी 2016-17 में खाली रह गयीं.
पिछले साल इंजीनियरिंग की 14.5 लाख सीटों पर दाखिला नहीं हुआ. तकनीकी शिक्षा के नियमन की शीर्ष संस्था भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् के आगे लगातार यह दुविधा बनी हुई है कि कम दाखिलावाले इंजीनियरिंग कॉलेजों को बंद करने के निर्देश न जारी करना पड़े. समस्या का एक पहलू रोजगार के घटते अवसरों से जुड़ता है. साल 2016 में बीई/बीटेक के लगभग आठ लाख डिग्रीधारकों में से महज 40 फीसदी को ही कैंपस सेलेक्शन के जरिये नौकरी मिल सकी थी. कई हालिया अध्ययनों में ध्यान दिलाया गया है कि देश में तकनीकी शिक्षा गुणवत्ता के लिहाज से नयी शक्ल लेती अर्थव्यवस्था की जरूरतों से एक हद तक बेमेल है.
पिछले साल आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंजीनियरिंग के 95 फीसदी डिग्रीधारक इतने सक्षम नहीं हैं कि उन्हें सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के काम में अवसर मिल सके. इस हालत के पीछे कई वजहें गिनायी जा सकती हैं, जिनमें पढ़ाई का बहुत अधिक खर्च तथा शोध-अनुसंधान की सुविधा और योग्य शिक्षकों के अभाव से लेकर दाखिले के क्रम में होनेवाला भ्रष्टाचार तथा पुराने पड़ चुके पाठ्यक्रम प्रमुख हैं. समुचित तकनीकी शिक्षा और संसाधन न सिर्फ बेहतर रोजगार के लिए जरूरी हैं, बल्कि देश के सर्वांगीण विकास में भी इनकी अहम भूमिका है. ठोस योजना और नीति बनाने के लिहाज से सरकार की ताजा पहल निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन इस संबंध में आवश्यक और त्वरित कार्यान्वयन को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel