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प्लास्टिक से आजादी

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स्तेमाल की आसानी की वजह से प्लास्टिक आज रोजमर्रा की जरूरी चीज है. मुश्किल यह है कि यह सिलसिला यूं ही जारी रहा, तो फिर शायद प्लास्टिक धरती के लिए एटमी हथियारों से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है. प्लास्टिक जीव-जगत के स्वभाव के एकदम उलट चीज है यानी लगभग अजर-अमर. जटिल पॉलिमर की मौजूदगी के चलते पूरी तरह से खत्म होने में इसे 500 से 1000 साल लग जाते हैं.
इस लिहाज से एकल उपयोग वाले प्लास्टिक (थैली, बोतल, कवर आदि) के इस्तेमाल पर भारत सरकार द्वारा 2022 तक पूरी तरह से रोक लगाने का फैसला बहुत जरूरी और सराहनीय है. उपयोग होते प्लास्टिक का करीब 50 फीसदी हिस्सा इसी श्रेणी में आता है. भारत में प्लास्टिक की सबसे ज्यादा खपत (45 फीसदी, जो वैश्विक औसत से 10 फीसदी ज्यादा है) पैकेजिंग में होती है.
इस पर लगाम कसना तुलनात्मक रूप से कहीं अधिक व्यावहारिक है. सरकार के फैसले को संयुक्त राष्ट्र ने ठीक ही अभूतपूर्व कहा है, क्योंकि आर्थिक असर को देखते हुए ऐसी पहल के लिए बड़े साहस की जरूरत थी. हमारे देश में प्लास्टिक उद्योग 11 लाख करोड़ रुपये का है और 30 हजार औद्योगिक इकाइयां इसके उत्पादन से जुड़ी हुई हैं. वर्ष 1950 के दशक के शुरू में इसका का वैश्विक उत्पादन 20 लाख टन था, जो 2015 में 38 करोड़ टन तक जा पहुंचा. बीते सत्तर सालों में दुनिया ने आठ अरब टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन किया है, जिसमें से 6.3 अरब टन कचरा बन चुका है.
सालाना 1.30 करोड़ टन इसका कूड़ा समुद्र में बहा दिया जाता है. यह समुद्री जीवन के लिए ही नहीं, पूरे पारिस्थितिकीय तंत्र के लिए खतरे की घंटी है. समुद्र में डाले जानेवाले प्लास्टिक के कचरे में भारत और चीन जैसे देशों का योगदान 60 फीसदी है. भारत में फिलहाल सालाना 90 लाख टन प्लास्टिक कचरा जमा होता है, पर अफसोस की बात यह है कि इस विशाल कचरे से निबटने के लिए हमारी तैयारी समुचित नहीं है. महज यह कहकर संतोष नहीं किया जा सकता है कि हमारे देश में प्रति व्यक्ति प्लास्टिक उपयोग अभी बहुत कम है.
अमेरिका में यह आंकड़ा 2014-15 में 110 किलो, चीन में 38 किलो और ब्राजील में 32 किलो रहा था, जबकि भारत में इसका औसत 11 किलो था. भारत में दोबारा इस्तेमाल के लिए प्लास्टिक को रिसाइकिल करने की दर वैश्विक औसत (14 फीसदी) से बेशक बेहतर है, फिर भी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक प्लास्टिक के कचरे के निबटान के मामले में विकसित देशों की तुलना में भारत बहुत पीछे है.
प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल और इसके विनाशकारी दुष्परिणामों को देखते हुए उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार 2022 से पहले ही एकल उपयोगवाले प्लास्टिक पर रोक लगाने का अपना लक्ष्य पूरा कर लेगी, पर इस मसले पर उद्योग जगत और आम नागरिकों के पूरे सहयोग की भी दरकार है.
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