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बंगाल में लोकतंत्र का मखौल

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बंगाल में लोकतंत्र का मखौल
II प्रसेनजीत बोस II
टिप्पणीकार
boseprasenjit@gmail.com
पश्चिम बंगाल का मौजूदा पंचायत चुनाव पूरी तरह से लोकतंत्र के साथ घटिया मजाक है. फिलहाल राज्य में पंचायत के पदों की संख्या करीब 48 हजार है. साल 1978 से हर पांच वर्ष पर राज्य में पंचायत के चुनाव हो रहे हैं.
उस समय से दो बार- 2003 में वाम मोर्चे की सरकार और 2013 में तृणमूल कांग्रेस की सरकार के तहत- सबसे ज्यादा निर्विरोध उम्मीदवार चुने गये थे. लेकिन, तब भी उनका आंकड़ा 10-11 फीसदी से अधिक नहीं था. इस बार ऐसे उम्मीदवारों की तादाद 34 फीसदी है. बीरभूम जैसे कुछ जिले हैं, जहां यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा है.
ये सभी राज्य में सत्ताधारी पार्टी से संबद्ध हैं. यह सब माफिया और आपराधिक ताकत के जोर पर अंजाम दिया गया है. सत्ता के शीर्ष के निर्देश पर प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ है. इस पूरे प्रकरण की भयावह परिणति मतदान के दिन और अगले दिन हुई बड़ी संख्या में मौतों के रूप में हमारे सामने है. अब सवाल यह उठता है कि इसके लिए आखिरकार जिम्मेदार कौन है.
एक तो वे माफिया और गुंडा तत्व हैं, जो गांवों में उत्पात दिखाते नजर आ रहे हैं. परंतु ये लोग महज मोहरे भर हैं. इन घटनाओं की असली जिम्मेदारी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की है. कानून-व्यवस्था बहाल रखने की जवाबदेही राज्य सरकार और प्रशासन की है, किंतु प्रशासनिक अमला लोकतंत्र की इस हत्या में शामिल है.
लोकतांत्रिक व्यवस्था को ऐसे तबाह करने और ग्रामीण जनता पर ऐसा दमन थोपने का एक नतीजा यह हुआ है कि लोगों में मौजूदा सरकार के खिलाफ भारी असंतोष पैदा हो रहा है. इसका एक असर यह हो रहा है कि भारतीय जनता पार्टी का जनाधार बढ़ रहा है, खासकर झारखंड से सटे आदिवासी-बहुल इलाकों में.
शेष बंगाल में भी ऐसे माहौल में भाजपा के प्रति लोगों का रुझान देखने को मिल रहा है. लोग अपने जानो-माल की हिफाजत के लिए भाजपा की ओर भाग रहे हैं. ऐसा नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस को इसका नुकसान नहीं हो रहा है. राज्य में पंचायत की 48 हजार सीटों में से करीब नौ हजार पर पार्टी के बागियों ने अपनी उम्मीदवारी पेश की है.
मुख्यमंत्री पिछले कुछ सालों से ग्रामीण विकास की अपनी पहलों को लेकर जो बड़े-बड़े दावे करती रही हैं, उसकी भी पोल खुलती दिख रही है. अगर सरकार ने सही में गांवों की बेहतरी के लिए काम किया होता, तो दबंगई और आतंक का सहारा लेकर पंचायतों पर दबदबा बनाने की जरूरत नहीं पड़ती.
इस संदर्भ में बेरोजगारी की समस्या बहुत अहम है, जो देश के साथ बंगाल के लिए भी बड़ी चुनौती है. ग्रामीण बंगाल में बेरोजगारी या सीमित रोजगार की मुश्किलें गंभीर हैं. राज्य सरकार की शह पर गांवों के विकास के नाम पर पंचायतें लूट का अड्डा बनी हुई हैं. गांवों के बेरोजगारों को तृणमूल कांग्रेस के माफिया तत्व अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.
अपने रवैये से सत्ताधारी पार्टी लोकतंत्र की कब्र तो तैयार कर ही रही है, साथ ही वह अपने लिए भी कब्र खोद रही है. पंचायत चुनाव में व्यापक धांधली और हिंसा को रोक पाने में राज्य के चुनाव आयुक्त पूरी तरह से विफल रहे हैं.
वर्ष 2013 के चुनावों के दौरान भी ऐसी शिकायतें सामने आयी थीं, किंतु तब मीरा पांडे जैसी अधिकारी चुनाव आयुक्त थीं. उन्होंने बखूबी अपना कर्तव्य निभाते हुए बेहतर चुनाव कराया था. मौजूदा चुनाव आयुक्त एके सिंह अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सके हैं तथा वे राज्य सरकार और तृणमूल कांग्रेस के हाथ में खेल रहे हैं.
इतना सब कुछ होने के बाद उन्हें अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. एक घटना से चुनाव आयुक्त के रवैये को समझा जा सकता है. उन्होंने एक अधिसूचना जारी कर नामांकन की आखिरी तारीख को एक दिन के लिए बढ़ा दिया था. इसके बाद राज्य के दो मंत्रियों और एक तृणमूल सांसद ने उनके घर पर जाकर दबाव बनाने का प्रयास किया. चुनाव आयुक्त ने संवैधानिक दायित्वों को ताक पर रखकर इन नेताओं की बात सुनी और अपनी अधिसूचना को रद्द कर दिया.
यह भी आश्चर्य की बात है कि यह सब देखते हुए भी सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय ने इस चुनाव को होने दिया. पहले से ही ऑनलाइन नामांकन की प्रणाली को लागू कर दिया जाना चाहिए था. इस चुनाव की अब कोई विश्वसनीयता नहीं बची है. इसके साथ ही राज्य के चुनाव आयोग से संबंधित कानूनों में भी अपेक्षित सुधार पर चर्चा होनी चाहिए, ताकि उसे राज्य सरकार के चंगुल से मुक्त कराया जा सके.
तृणमूल से लोगों की नाराजगी का फायदा उठाने के साथ भाजपा सांप्रदायिक माहौल बनाकर भी अपने पक्ष में लामबंदी बनाने की कोशिश कर रही है. बीते दो साल से छोटे दंगे-फसाद और रामनवमी में उन्मादी जुलूसों का सिलसिला उसकी रणनीति के हिस्से हैं. सत्ताधारी पार्टी के मुख्य विपक्ष के रूप में भाजपा का उभार आज पश्चिम बंगाल की राजनीतिक सच्चाई है.
जहां तक वामपंथी खेमे की बात है, उनके लिए वापसी का पहले मौका जरूर था, पर वे अपनी कमियों के कारण उसका फायदा उठाने में कामयाब नहीं हो सके. यदि वे अपनी गलतियों को सुधारने का प्रयास करते, तो लोग उनसे उम्मीद लगा सकते थे. आज की तारीख में लोग थोक के भाव में माकपा छोड़कर भाजपा की ओर जा रहे हैं. निश्चित रूप से यह स्थिति बंगाल के प्रगतिशील और जनवादी खेमे के लिए बड़ी चिंता की बात है.
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