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सवालों के घेरे में विराट कोहली

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आशुतोष चतुर्वेदी
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
भारतीय क्रिकेट इन दिनों में चर्चा में है. अगर आप दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर गयी भारतीय टीम पर नजर रख रहे हों, तो आप पायेंगे कि बल्लेबाजी में उसकी हालत खस्ता है. हालांकि भारत ने तीन टेस्ट मैचों की सीरीज में अंतिम टेस्ट जीतकर किसी तरह अपनी इज्जत बचायी है.
पहले दो टेस्ट भारतीय टीम दक्षिण अफ्रीका से हार गयी थी. विकेटकीपिंग के मामले में तो टीम की कमजोरी सबके सामने उभरकर सामने आ गयी है. पहले टेस्ट में साहा थे, फिर पार्थिव पटेल आये और तीसरे टेस्ट में सब्स्टीट्यूट के रूप में दिनेश कार्तिक विकेटकीपिंग करते दिखायी दिये. दूसरी ओर भारतीय टीम के चयन ने सबको हैरान किया है.
यहां तक कि विराट कोहली की कप्तानी पर सवाल उठने लगे हैं. बिना बात की आक्रामकता का प्रदर्शन करते वह नजर आये. एक टेस्ट में तो उनकी मैच फीस में भी कटौती कर दी गयी. कप्तान विराट के फैसले से तो सभी अचंभित हैं. कभी बाहरी मैदानों पर सबसे सफल भारतीय बल्लेबाजों में से एक अजिंक्य रहाणे को बाहर कर दिया जाता है, तो कभी पहले टेस्ट के सबसे सफल गेंदबाज भुवनेश्वर कुमार को दूसरे टेस्ट में बाहर बैठा दिया जाता है.
रोहित शर्मा को टीम में शामिल करने का फैसला हो या फिर मुश्किल हालात में पार्थिव पटेल को आगे बल्लेबाजी के लिए भेजने का निर्णय, इन सब पर सवाल उठ रहे हैं. महान बल्लेबाज और अपनी बेबाक राय रखने वाले सुनील गावस्कर इन सबसे अचंभित हैं.
सुनील गावस्कर का कहना है कि आप पहले टेस्ट से ही इस टीम के चयन को देखिए. भारतीय क्रिकेट से जुड़े हम सभी लोगों को दुआ करनी चाहिए कि यह जो कर रहे हैं, वह सफल साबित हो जाए. गावस्कर टीम से इतने निराश दिखे कि उन्हें महेंद्र सिंह धौनी की याद आ गयी. उन्होंने कहा कि काश धौनी ने संन्यास नहीं लिया होता. उन्होंने कहा कि अगर धोनी चाहते, तो वह खेल सकते थे. लेकिन साफ है कि उन पर कप्तानी का बहुत दबाव था. गावस्कर का कहना था कि धौनी को कप्तानी छोड़ कर बतौर विकेटकीपर-बल्लेबाज टीम में बने रहना चाहिए था, क्योंकि उनकी सलाह अमूल्य है.
हाल में धौनी को देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से भी अलंकृत किया गया है.हालांकि सम्मान धौनी के लिए यह नयी बात नहीं है. इससे पहले उन्हें खेल रत्न, पद्मश्री और अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. कुछ समय पहले धौनी के खिलाफ सोशल मीडिया में एक सुनियोजित अभियान चला था. इसमें यह बताने की कोशिश की गयी कि वह चुक गये हैं. धौनी पुराने वाले धौनी नहीं रहे हैं. उनके मुकाबले अन्य खिलाड़ियों को खड़ा करने का प्रयास भी हुआ था. साथ ही यह साबित करने की कोशिश भी की गयी थी कि उन्हें अब विदा करने का वक्त आ गया है वगैरह-वगैरह. धोनी के खिलाफ इस तरह के अभियान समय-समय पर चलते रहे हैं. लेकिन हर बार धौनी ने अपनी बल्लेबाजी और विकेटकीपिंग, दोनों से अपने आलोचकों को करारा जवाब दिया है. उन्होंने हर बार यह साबित किया है कि भारतीय टीम में अब भी उनका कोई विकल्प नहीं है.
अगर पिछले तीन टेस्ट मैचों पर आम नजर डालें, तो आपको विराट कोहली बेवजह आक्रामक होते दिखायी देते हैं. आक्रामक और अहंकारी होने के बीच बहुत महीन लाइन है. भारतीय कप्तान विराट कोहली इस लाइन को कई बार पार करते नजर आते हैं. वह अक्सर विरोधी खिलाड़ियों से उलझते हैं, कई बार विरोधी बल्लेबाज के आउट होने पर उस पर टिप्पणी करते हैं और अंपायर के फैसलों पर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देते नजर आते हैं.
ये बातें क्रिकेट विशेषज्ञों को भी पसंद नहीं आ रहीं. सौरव गांगुली को आक्रामक कप्तान के रूप में याद किया जाता है. उन्होंने भारतीय टीम के सोचने का नजरिया बदला. लेकिन उन्होंने करियर में कभी इतने विवादित नहीं रहे, जितने विराटएक साल में नजर आ रहे हैं. चिंता की बात यह है कि कोच रवि शास्त्री भी विराट कोहली को नियंत्रित नहीं करते दिखायी दे रहे हैं.
कुछेक चयनकर्ता तो इसे विराट की खासियत बताते हैं. एक और चिंता की बात है कि टीम में ऐसा कोई खिलाड़ी नहीं है, जो उनके फैसलों से असहमत होने की हिम्मत कर सके. सहवाग ने एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में कहा कि उन्हें लगता है कि विराट कोहली को एक ऐसे खिलाड़ी की जरूरत है, जो मैदान पर उन्हें उनकी गलतियां बता सके. हर टीम में चार-पांच ऐसे खिलाड़ी होते हैं, जो कप्तान को सलाह देते हैं और उन्हें मैदान पर गलतियां करने से रोकते हैं. फिलहाल कोई भी ऐसा खिलाड़ी नहीं है, जो कोहली को गलत फैसला करने से रोक सके. साथ ही सहवाग ने मुख्य कोच रवि शास्त्री पर भरोसा जताते हुए कहा कि वह जरूर कोहली को सलाह देते होंगे.
इतिहासकार और चार महीने तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित क्रिकेट प्रशासकीय कमेटी (सीएसी) का हिस्सा रहे लेखक रामचंद्र गुहा ने हाल में लिखे एक लेख में विराट कोहली पर सवाल उठाये थे.
हालांकि उन्होंने विराट कोहली को भारतीय क्रिकेट इतिहास का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज करार दिया, लेकिन साथ-ही-साथ उन पर कई सवाल भी उठाये थे. रामचंद्र गुहा ने कहा है कि बीसीसीआई जैसी संस्था विराट कोहली के आगे बौनी पड़ रही है. वह विराट कोहली को अपनी सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ भारतीय टीम का कप्तान बनते देखना चाहते हैं. लेकिन उन्हें बतौर कप्तान अपने अधिकार और अहंकार, दोनों में ही विनम्रता लानी पड़ेगी.
गुहा कहते हैं कि बोर्ड अधिकारी उन मुद्दों को भी विराट कोहली के पाले में डाल देते हैं, जो भारतीय कप्तान के दायरे में नहीं आते. भविष्य के टूर प्रोग्राम तैयार करने पर चर्चा होनी थी, तो बोर्ड के कानूनी सलाहकार ने कहा कि विराट की सहमति हर हाल में ली जानी चाहिए.
जब बेंगलुरु स्थित नेशनल क्रिकेट अकादमी के प्रबंधन का मामला सामने आया, तो बोर्ड के सीइओ ने सुझाव दिया कि विराट कोहली की राय अंतिम होनी चाहिए. सीएसी के चेयरमैन विनोद राय ने विराट कोहली के व्यक्तित्व के आगे अपनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता को समर्पित कर दिया.
कुछ ऐसा ही क्रिकेट कमेटी ने भी किया. सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, विनोद राय और लक्ष्मण ने टॉम मूडी की अनदेखी कर रवि शास्त्री को चुना, क्योंकि ये दिग्गज विराट कोहली से घबरा गये और इन्होंने संस्था को व्यक्ति विशेष के अधीन कर दिया. गुहा का कहना है कि वर्तमान में कोचिंग स्टॉफ, चयन समिति और प्रशासक, सभी-के-सभी कप्तान विराट कोहली के आगे बौने हैं. हो सकता है कि रामचंद्र गुहा की राय में थोड़ी अतिरंचना हो, लेकिन ये सारे संकेत भारतीय क्रिकेट के लिए शुभ नहीं हैं.
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