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हमारे पर्वों का मर्म

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कविता विकास

लेखिका

गणेश पूजन के बाद से देश में पर्वों का मौसम शुरू हो जाता है. हमारे जीवन के उत्सव से जुड़ा है पर्वों का मर्म. मनुष्य के जीवन में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय भावनाओं को जोड़नेवाले उत्सव भी पर्व कहलाते हैं. देश की आत्मा गांव है और ग्राम्य जीवन के उत्पाद पूरे देश का पेट पालते हैं. ऋतुओं से जुड़े पर्वों को मनाने के ढंग भले ही आधुनिकता की भेंट चढ़ रहे हों, पर ग्राम्य संस्कृति अब भी बहुत कुछ सहेज कर रखी हुई है.

एक समय था, जब पर्व के साथ अपार खुशियां जुड़ी होती थीं. वस्तुतः आज भी छोटे बच्चे ही पर्वों का मर्म समझते हैं, जो नये कपड़े पहन कर, मिठाइयां खाकर, मेले के झूले में चढ़कर और ठेले के गोलगप्पे का आनंद लेकर खुश होते हैं.

पहले के जमाने में पर्व के दिन घर के बड़ों के पैर छूकर बच्चे उनसे आशीर्वाद लेते थे और कुछ पैसे भी सौगात के तौर पर पाते थे. पर, यह परंपरा अब समाप्त होती जा रही है. जैसे-जैसे समाज आधुनिकता के रंग में रंगता जा रहा है, वैसे-वैसे आपसी सौहार्द्र, संस्कृति और आंतरिक खुशी से भी दूर होता जा रहा है.

आधुनिकता और वैश्वीकरण का प्रभाव सबसे ज्यादा बाजार पर पड़ा है. पहले, साल में एक-दो बार ही त्योहारों पर जमकर खरीदारी होती थी, पर अब तो मॉल में जब-जब डिस्काउंट के आकर्षण जाल में लोग फंसते हैं, तब-तब खूब खरीदारी होती है.

संयुक्त परिवारों का विघटन चाहे नौकरी, व्यवसाय या शिक्षा रहा हो, पर अकेलेपन का खिंचाव, जो कि रोक-टोक से परे है, सभी को लुभाने लगा. एकल परिवार में अपने मन मुताबिक जीने का आकर्षण है. इसलिए लोग अब पर्वों पर भी घर-गांव जाने से कतराते हैं. घुमक्कड़ी संस्कृति पनपने लगी. काम के तनाव से मुक्ति पाने के लिए चंद दिनों यात्रा पर निकल जाने पर उनको ताजगी के साथ सुकून भी मिलने लगा. पर, इसकी एक खामी यह भी रही कि परिवार के सदस्यों से साथ बच्चे आत्मीय संबंध बनाने से चूकते गये.

पर्व का अर्थ वाकई बहुत गूढ़ है. पर्वों का मर्म खुशियां बांटना है. मेल-मिलाप इसका अभिन्न अंग है. इसलिए होली या ईद जैसे पर्वों में एक-दूसरे के घर जाने की परंपरा है. पर्वों के मूल में भी जायें, तो पायेंगे कि ये खुशी के प्रतीक स्वरूप ही मनाये जाते हैं

कहीं फसलों के पक जाने की खुशी है, तो कहीं बुराई के ऊपर अच्छाई के विजय-प्रतीक की खुशी. कहीं जन्मोत्सव की खुशी तो कहीं रिश्तों की गरिमा के संरक्षण की खुशी. घर, समाज और देश का धन-धान्य से परिपूर्ण होना पर्व की उत्पत्ति का कारण है.

कहने का तात्पर्य है कि पर्व हैं, तो संस्कृति है. संस्कृति से ही मानव-मूल्यों का संवर्धन होता है, जिनसे हमारी सभ्यता का पुनर्निर्माण संभव है. अतः जीवन में त्योहारों का आनंद लें, सारी व्यस्तता और सारे राग-द्वेष एक तरफ रखकर.

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