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Home National राष्ट्रपति पद की रेस में लालकृष्ण आडवाणी से डॉ मुरली मनोहर जोशी क्यों निकल रहे हैं आगे?

राष्ट्रपति पद की रेस में लालकृष्ण आडवाणी से डॉ मुरली मनोहर जोशी क्यों निकल रहे हैं आगे?

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राष्ट्रपति पद की रेस में लालकृष्ण आडवाणी से डॉ मुरली मनोहर जोशी क्यों निकल रहे हैं आगे?

नयी दिल्ली : भारतीय जनता पार्टी के दो मार्गदर्शक बुजुर्ग नेतालालकृष्ण आडवाणी व डॉ मुरलीमनोहर जोशी भले आजपार्टी के दैनिकगतिविधिमेंहाशिये पर हों, लेकिन देश के शीर्ष पद राष्ट्रपति के लिए दोनोंकेनामों की चर्चा शुरू हो गयी है.अगलेसाल देश के मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल समाप्त हो जायेगा और उसके बाद राष्ट्रपति चुनाव होगा, जिसमेंतय है कि सत्ताधारी पार्टी द्वारा नामित उम्मीदवार ही विजयी होगा. देश में कुछ अपवादों को छोड़ कर यह एक आमपरंपरा है कि सत्ताधारीपार्टी अपनेवरिष्ठवबुजुर्ग नेताआेंका नाम राष्ट्रपति केलिएआगे करती है. ऐसे में भाजपा केदो कद्दावरनेताओंलालकृष्ण आडवाणी और डॉ मुरलीमनोहर जोशी का नाम स्वत:सामनेआता है. ये दोनों नेता वाजपेयी-आडवाणी-जोशी की मशहूर राजनीतिकतिकड़ी के दो नाम है. पर, अबजो स्थितियां बनती दिख रही हैं, उसमें ऐसा लगता है कि डॉ जोशी राष्ट्रपति की रेस में आडवाणी को पीछे छोड़े देंगे.

इसलिए आडवाणी पर भारी पड़ रहे हैं डॉ जोशी

डॉ मुरली मनोहर जोशी भाजपा के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघकेकरीब हैं.आडवाणी की तुलना में संघ प्रमुखमोहन भागवत केवेअधिककरीब हैं. संघ के दूसरे नेताओंसेभीउनकेरिश्ते हैं. आडवाणी केपाकिस्तान दौरे परमोहम्मद अलीजिन्ना के संबंधमेंदिये गये बयान के बाद उनकेसंघ से संबंध कभीअनुकूलनहीं रहे औरयहभी कहा जाता है कि 2009मेंविकल्पहीनता की स्थितिमें उन्होंने जोर देकर अपना नाम प्रधानमंत्रीपदके लिए प्रस्तावित करवाया. आडवाणी की तुलना में डॉ जोशी की उम्र कम है, वह भी उनके पक्ष में जाती है. आडवाणी 89 साल के हो चुके हैं और अगले साल जब राष्ट्रपति पद का चुनाव होगा तब वे 90 साल के हो जायेंगे और इस पद परचुनेजाने की स्थिति में उन्हें पांच साल का कार्यकाल पूरा करना होगा. संघ की कार्यपद्धति में उनकी उम्र भी आड़े आती है. संघ अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व को पसंद करता है. डॉ जोशी उत्तरप्रदेश से आते हैं और वहां के प्रभावी ब्राह्मण समुदायकाप्रतिनिधत्व करते हैं. अगले साल होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राष्ट्रपति पद के लिए उनके नाम का स्पष्ट संकेत देकर भाजपा अपने टूटे ब्राह्मण वोट बैंक को पुन: वापस खुद से जोड़ना चाहती है.

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