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राहुल गांधी की केदारनाथ यात्रा और केदारनाथ मंदिर की महिमा

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राहुल गांधी की केदारनाथ यात्रा और केदारनाथ मंदिर की महिमा

देश के प्रमुख हिन्दू तीर्थों में से एक केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है. वैसे तो केदारनाथ धाम की महिमा हजारों साल पुरानी है लेकिन साल 2013 में यहां आई भयंकर दैवी आपदा के बाद केदारनाथ का नजारा बदल गया था. हजारों की संख्या में लोगों के मारे जाने के बाद केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से पूरी तरह उजड़ गए इस इलाके को फिर से यात्रा के लायक बनाने के बाद अब दर्शनार्थियों की आवाजाही फिर से शुरू हो गयी है. बाबा केदारनाथ का दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं में अब एक नया नाम कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का भी जुड़ गया है. राहुल आज गौरीकुंड से केदारनाथ तक 18 किलोमीटर पैदल यात्रा करते हुए भगवान के दर्शन करने पहुंचेंगे.

उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है. यहां की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्‍य ही दर्शन के लिए खुलता है. पत्‍थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में मान्यता है कि इसका निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था. यहां स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है. ऐसा कहा जाता है आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया.

जून 2013 के दौरान भारत के उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश राज्यों में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन के कारण केदारनाथ सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रहा. मंदिर की दीवारें गिर गई और बाढ़ में बह गयी. इस ऐतिहासिक मन्दिर का मुख्य हिस्सा और सदियों पुराना गुंबद सुरक्षित रहे लेकिन मन्दिर का प्रवेश द्वार और उसके आस-पास का इलाका पूरी तरह तबाह हो गया.
केदारनाथ की महिमा और इतिहास
केदारनाथ धाम की बड़ी महिमा है. उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनों के दर्शनों का बड़ा ही माहात्म्य है. केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनाथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश पूर्वक जीवन मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है.
ये मंदिर इतना पुराना है कि इस मन्दिर की आयु के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, पर एक हजार वर्षों से केदारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा रहा है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन के अनुसार ये 12-13वीं शताब्दी का है. ग्वालियर से मिली एक राजा भोज स्तुति के अनुसार उनका बनवाय हुआ है जो 1073-99 काल के थे. एक अन्य मान्यतानुसार वर्तमान मंदिर 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा बनवाया गया जो पांडवों द्वारा द्वापर काल में बनाये गये पहले के मंदिर की बगल में है.
यह मन्दिर एक छह फीट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है. मन्दिर में मुख्य भाग मण्डप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है. बाहर प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं. मन्दिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता.
मन्दिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है. प्रात:काल में शिव-पिण्ड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है. तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है. इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है. उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है. भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं. केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं.
केदारनाथ के प्रकट होने की पौराणिक कथा
इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना से सम्बंधित एक कथा के अनुसार, हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे. उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया. यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं.
इससे जुड़ी दूसरी कहानी के मुताबिक, ऐसा माना जाता है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव अपने कौरव भाइयों की भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे. इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन शिवजी उन लोगों से रुष्ट थे. भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले.
उसके बाद पांडव उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे मगर भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतर्ध्यान होकर केदार में जा बसे. दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए. भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले. पांडवों को संदेह हो गया था.
अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया. अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल भीम के पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए. तब भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतर्ध्यान होने लगा. ये देखकर भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया. भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए. उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया.
उसी समय से बैल रूपी भगवान शंकर की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजी जाती है. ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ. अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है. शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए. इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है. यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं.
राहुल गांधी के अलावा बड़े-बड़े लोग जाते हैं केदारनाथ दर्शन के लिए
केदारनाथ के ज्योतिर्लिंग की महिमा इतनी अधिक है कि यहां देश-विदेश से सैलानी दर्शन करने आते हैं. इनके अलावा बड़े-बड़े वीआइपी भी समय-समय पर यहां बाबा केदार के दर्शन को आते रहते हैं. यहां आने वाले बड़े लोगों और उद्योगपतियों में प्रसिद्ध उद्योगपति अनिल अम्बानी, उनकी पत्नी टीना अम्बानी, पूर्व सपा नेता और सांसद अमर सिंह, अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन और जया बच्चन जैसे लोग भी शामिल हैं.
अब इन बड़े लोगों की फेहरिस्त में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का नाम भी जुड़ गया है. राहुल गांधी को वैसे भी एडवेंचर के शौक़ीन माने जाते हैं. रोजाना जिम में कसरत करने वाले राहुल ने अपने इसी मिजाज और बाबा केदारनाथ के मंदिर के अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित होने को देखकर 18 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हुए मंदिर जाने का कार्यक्रम बनाया है. राहुल यहां तक की यात्रा पैदल पूरी करते हुए भगवान शंकर के दर्शन और पूजा करेंगे. इसके पहले जून 2013 में उत्तराखंड त्रासदी के बाद राहुल गांधी उत्तराखंड की तबाही का आंकलन करने गए थे, तब राहुल के देर से जाने पर विवाद पैदा हो गया था.

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