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नक्सली रणनीतियों से निपटने का पुलिस का जिंगल्स

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नक्सली रणनीतियों से निपटने का पुलिस का जिंगल्स

रायपुर : नक्सल समस्या से जूझ रहे छत्तीसगढ में राज्य सरकार ने अब नक्सली विचारधारा से ग्रामीणों को सतर्क करने तथा नक्सलियों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए जिंगल्स का सहारा लेना शुरु किया है.

‘‘मुखिया – भाइयों अब हमे समझ में आ गया है कि वामपंथी उग्रवादी आपको हिंसा का पाठ पढाकर दिगभ्रमित कर रहे हैं.

ग्रामीण – पर उनका कहना है कि प्रशासन आदिवासी क्षेत्रों का विकास नहीं चाहता है और ग्रामीणों को गरीब बनाए रखना चाहता है.

मुखिया – यदि वामपंथी उग्रवादी विकास के पक्षधर हैं तो सोचो कि वे पंचायत भवन, स्कूल, आश्रम को क्यों तोड रहे हैं. एक समय था जब हम बसों और टैक्सियों का इस्तेमाल करके कस्बों शहरों में अपने बीमार परिवारजनों का ईलाज कराते थे. गरीब मजदूरों की लडाई लडने का झांसा देने वाले सडके क्यों काट रहे हैं.

ग्रामीण – हां मुखिया जी हम समझ गए हैं. दरअसल वामपंथी उग्रवादी नहीं चाहते हैं कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास की धारा बहे। हम गांव वाले सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर उन्नति करें.

मुखिया – जरा सोचिए, स्कूल, पंचायत भवन और सडकें नष्ट करने वालों का साथ देना कहां तक उचित है. आइए विध्वंसकारियों का साथ छोडकर विकास का साथ दें.’’

ये पंक्तियां राज्य के नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र के आदिवासी इलाकों में रोज सुनाई देती है. यह राज्य सरकार सरकार द्वारा बनाई गई उन जिंगल्स में से एक है जिसमें ग्रामीणों को विकास में भागीदार बनने और नक्सलियों को मुख्यधारा में शामिल होने की अपील की गई है.

राज्य का नक्सल प्रभावित बस्तर इलाका आजादी के दशकों बीत जाने के बाद भी विकास से लगभग अछूता है और इसका कारण यहां की नक्सल समस्या है. इस क्षेत्र में सडकों और संचार के साधनों का अभाव है. लेकिन रेडियो ही एक ऐसा माध्यम है जिसकी पहुंच जंगल के भीतरी इलाकों में है. क्षेत्र में रेडियो की ताकत को ध्यान में रखते हुए राज्य के पुलिस विभाग ने इसका इस्तेमाल ग्रामीणों और नक्सलियों तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए किया है. राज्य के पुलिस विभाग ने आकाशवाणी के सहयोग से लगभग एक दर्जन जिंगल्स तैयार किए हैं जिसमें ग्रामीणों से नक्सलियों का सहयोग न कर शासन का सहयोग करने और विकास में शामिल होने की अपील की गई है. वहीं कुछ जिंगल्स में नक्सलियों को आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए कहा गया है.

जिंगल्स को तैयार करने में मुख्य भूमिका निभाने वाले राज्य के खुफिया विभाग के पुलिस महानिरीक्षक दीपांशु काबरा कहते हैं ‘रेडियो ही एक ऐसा माध्यम है जिससे बस्तर क्षेत्र के प्रत्येक गांवों और प्रत्येक आदिवासी तक पहुंचा जा सकता है. रेडियो की इस पहुंच को ध्यान में रखते हुए विभाग ने जिंगल्स के माध्यम से अपनी बात लोगों तक और नक्सलियों तक पहुंचाने की कोशिश की है.’ दीपांशु बताते हैं कि फरवरी महीने के दूसरे पखवाडे से बस्तर जिले के जिला मुख्यालय जगदलपुर स्थित आकाशवाणी केंद्र से इन जिंगल्स की शुरुआत की गई है.

जिंगल्स हिंदी, छत्तीसगढी, गोंडी और हल्बी भाषा में बनाए गए हैं. इसे सुबह से शाम तक लगभग हर आधे घंटे में चलाया जाता है. जिंगल्स को चार भाषाओं में तैयार इसलिए कराया गया है जिससे क्षेत्र की आदिवासी जनता आसानी से संदेशों को समझ सके. जिंगल्स को स्थानीय कलाकारों ने तैयार किया है और बोलचाल की भाषा का ही इस्तेमाल किया गया है. एक जिंगल में ग्रामीणों से कहा गया है कि जिन्होंने आपके हाथों में बंदूक थमाया है उन्हें पहचानों. वहीं दूसरे जिंगल में हिंसा नहीं विकास चाहिए का संदेश दिया गया है. जिंगल्स में आत्मसमर्पण नीतियों का लाभ लें और खुशहाल जीवन व्यतीत करें और गांधी जी के देश में हिंसा का कोई स्थान नहीं है जैसे संदेशों को भी शामिल किया गया है. उम्मीद है इसका असर ग्रामीणों और नक्सलियों में होगा.

राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक और नक्सल मामलों के जानकार विश्वरंजन संदेशों के रुप में जिंगल्स के इस्तेमाल को लेकर कहते हैं कि चुंकि यह अच्छा प्रयास है लेकिन आने वाले कुछ महीनों के बाद ही इसका असर देखने को मिल सकता है. वहीं राज्य के नक्सल मामलों के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक आर के विज का कहना है कि पुलिस जिंगल्स के माध्यम से बस्तर क्षेत्र के ग्रमीण और नक्सलियों तक अपनी बात पहुंचाना चाहती है. पुलिस को उम्मीद है कि आने वाले समय में लोग राज्य सरकार की बातों को समझेंगे और इसका बेहतर नतीजा सबके सामने होगा.

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