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कल आ सकता है ललित नारायण मिश्र हत्याकांड का फैसला

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कल आ सकता है ललित नारायण मिश्र हत्याकांड का फैसला
नयी दिल्ली: करीब 40 साल पहले बिहार के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या मामले पर कल फैसला आ सकता है. जिला न्यायाधीश विनोद गोयल ने 12 सितंबर को इस हत्याकांड में केंद्रीय जांच ब्यूरो और इस हत्याकांड के चारों अभियुक्तों के वकीलों की दलीलें सुनने की कार्यवाही पूरी की थी.
अदालत ने कहा था कि इस मामले में 12 नवंबर को फैसला सुनाया जायेगा लेकिन बाद में इसे निर्णय तैयार नहीं हो सकने के कारण आठ दिसंबर के लिये स्थगित कर दिया गया. यह मामला 2 जनवरी 1975 को समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर एक समारोह के दौरान हुये बम विस्फोट से संबंधित है.
तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र इस समारोह में शामिल होने आये थे. विस्फोट में जख्मी मिश्र की अगले दिन मृत्यु हो गयी थी. इस हत्याकांड के मुकदमे की सुनवाई के दौरान 200 से अधिक गवाहों से पूछताछ की गयी थी. इसमें अभियोजन पक्ष के 161 और बचाव पक्ष के 40 से अधिक गवाह शामिल थे. हत्याकांड में आरोपी वकील रंजन द्वि‍वेदी को 24 साल की उम्र में आनंद मार्ग समूह के चार सदस्यों के साथ आरोपी बनाया गया था.
द्वि‍वेदी के अलावा इस मामले में संतोषानंद अवधूत, सुदेवानंद अवधूत और गोपालजी अभियुक्त हैं. इस अभियुक्त की मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही मृत्यु हो गयी थी. इससे पहले, अभियुक्तों ने मुकदमे का निबटारा होने में अत्यधिक विलंब के आधार पर सारी कार्यवाही निरस्त करने के लिये शीर्ष अदालत का दरवाजा भी खटखटाया था. शीर्ष अदालत ने ही 17 अगस्त 2012 को इनकी याचिका खारिज करते हुये आदेश दिया था कि 37 साल से मुकदमे की सुनवाई पूरी नहीं हो पाने के आधार पर कार्यवाही निरस्त नहीं की जा सकती है.
इस हत्याकांड में 1 नवंबर 1977 को सीबीआइ की पटना स्थित अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया गया था. इसके बाद शीर्ष अदालत से अटार्नी जनरल के अनुरोध पर इस मुकदमे को 1979 में दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया था. गोपालजी के अलावा मिश्र हत्याकांड में नामित अन्य सभी आरोपियों को 20 मार्च 1975 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ए एन रे की हत्या के प्रयास के मामले में भी आरोपी बनाया गया था.
संतोषानंद और सुदेवानंद को बाद में सरकारी गवाह विक्रम के इकबालिया बयान के आधार पर न्यायमूर्ति रे के मामले में आरोपी बनाया गया था. इस मामले में संतोषानंद और सुदेवानंद को दस-दस साल कैद की सजा हुयी थी. जबकि रंजन द्वविेदी को चार साल की सजा हुयी थी. बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने संतोषानंद और सुदेवानंद की सजा बरकरार रखी थी लेकिन द्विवेदी को बरी कर दिया था.
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