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Home National महंगाई की मार से छोटा हो गया रावण का कद, 60-70 फीट की जगह इस बार बन रहे 40 फीट के पुतले

महंगाई की मार से छोटा हो गया रावण का कद, 60-70 फीट की जगह इस बार बन रहे 40 फीट के पुतले

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महंगाई की मार से छोटा हो गया रावण का कद, 60-70 फीट की जगह इस बार बन रहे 40 फीट के पुतले
नयी दिल्ली : महंगाई की मार से इस बार ‘रावण’ भी नहीं बच पाया है. पुतलों के बाजार में ‘रावण’ का कद छोटा हो गया है. 60-70 फीट की जगह इस बार आयोजकों द्वारा ज्यादातर 40 फीट के पुतले की मांग की जा रही है.
वहीं, इस बार विदेशों से भी पुतलों की मांग कम ही आ रही है. पश्चिम दिल्ली के तातारपुर गांव के पुतला बनाने वाले कारीगरों का कहना है कि अर्थव्यवस्था सुस्त है. साथ ही पुतला बनाने वाली सामग्रियों के दाम काफी बढ़ चुके हैं. ऐसे में हमें पुतलों का आकार काफी छोटा करना पड़ा है. 25 साल से पुतला बना रहे महेंद्र कहते हैं कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती है, जिसका असर पुतलों के कारोबार पर भी पड़ा है.
पुतला बनाने की सामग्री भी काफी महंगी हो चुकी है. 20 बांस की कौड़ी का दाम 1,200-1,300 रुपये हो गया है, जो पिछले साल तक 1,000 रुपये था. पुतला बांधने में काम आने वाला तार भी 50 रुपये किलो की बजाय 150 रुपये में मिल रहा है. कागज का दाम तो लगभग दोगुना हो गया है. ऐसे में पुतला जितना बड़ा होगा, लागत भी उतनी ही अधिक होगी.
तीन दशक से इस कारोबार से जुड़े सुभाष ने कहा कि कभी तातारपुर का रावण विदेश जाता था. यहां से पुतले विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया तक भेजे जाते थे, लेकिन अब वहां से मांग नहीं आती है. वहीं, राजू ने कहा कि इस बार 40 फीट के पुतले का दाम 20,000 रुपये है. पिछले साल तक यह 12,000-13,000 रुपये था.
पुतलों का प्रमुख बाजार है तातारपुर
तातारपुर पुतलों का प्रमुख बाजार है. तातारपुर और आसपास के इलाकों से पुतले हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब तक भेजे जाते हैं. इस समय तातारपुर और आसपास के इलाकों में 500 से अधिक पुतले बनाये जा रहे हैं, जबकि कभी अकेले तातारपुर में ही 1,000 से अधिक पुतले बनाये जाते थे. इनकी मांग हर साल लगातार घट रही है और आकार भी छोटा हो जा रहा है. पुतला बनाने वालों में दिल्ली के अलावा हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक तक के कारीगर शामिल हैं.
कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले की मांग कम
हरियाणा के करनाल निवासी संजय (कारीगर) ने बताया कि कभी तातारपुर और आसपास के इलाकों में 60-70 फीट तक के पुतले बनाये जाते थे, लेकिन अब दाम चढ़ने और जगह की कमी की वजह से आयोजक छोटे पुतलों की मांग करने लगे हैं. संजय कहते हैं कि आज रावण के पुतलों की तो मांग है, लेकिन कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों के कद्रदान कम ही हैं.
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