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लाल गलियारे में भाजपा को क्षेत्रीय दलों की चुनौती

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लाल गलियारे में भाजपा को क्षेत्रीय दलों की चुनौती
नयी दिल्ली : नक्सल प्रभावित 11 जिलों की साढ़े तीन दर्जन सीटों में से करीब 40 प्रतिशत सीटों पर पिछले 25 वर्षों से क्षेत्रीय दलों का दबदबा बरकरार है.
छत्तीसगढ़ एवं पश्चिम बंगाल को छोड़कर लाल गलियारे में क्षेत्रीय दल अब राष्ट्रीय दलों के लिए चुनौती हैं. छत्तीसगढ़ की नक्सल प्रभावित सीटों पर पिछले छह लोकसभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच टक्कर रही है, जबकि पश्चिम बंगाल में माकपा और तृणमूल कांग्रेस का प्रभुत्व बना रहा. चुनाव आयोग के पिछले छह चुनावों के आंकड़े के अनुसार, पश्चिम बंगाल की नक्सल प्रभावित झाड़ग्राम सीट 2014 में तृणमूल कांग्रेस और 2009 में माकपा जीती थी.
मिदनापुर और बांकुरा सीट 1996 से 2009 तक माकपा के कब्जे में थी और 2014 के चुनाव में दोनों सीट तृणमूल कांग्रेस जीती. पुरूलिया सीट 1996 से 2009 तक फारवर्ड ब्लॉक के पास थी और यहां 2014 में तृणमूल कांग्रेस जीती. बस्तर, कांकेर, लोहरदगा, खूंटी, पलामू, गिरिडीह, रांची, गया, नवादा, पश्चिम चंपारण, सासाराम, बोलांगीर, कोरापुट, बालाघाट, चंदौली सीटों पर भाजपा का प्रभाव रहा.
झारखंड के चतरा, पलामू जैसी नक्सल प्रभावित सीटों पर झामुमो, राजद जैसे क्षेत्रीय दलों का प्रभाव रहा. खूंटी, गिरिडीह, धनबाद और रांची सीट पर भाजपा ने अपना प्रभाव बनाये रखा हालांकि इन सीटों पर क्षेत्रीय दलों से उसे कड़ी चुनौती मिली. लोहरदगा सीट पर भाजपा और कांग्रेस के बीच टक्कर रही. बिहार की नक्सल प्रभावित सीटों में जमुई, जहानाबाद, मुंगेर, बांका, वैशाली और मुजफ्फरपुर सीट पर पिछले छह चुनाव में जदयू, राजद, लोजपा जैसे दलों का प्रभाव रहा.
औरंगाबाद सीट पर जनता दल एवं समता पार्टी ने कांग्रेस को चुनौती दी, वहीं नवादा सीट पर राजद ने 2004 एवं 1999 में जीत दर्ज की. मुजफ्फरपुर सीट पिछले छह चुनाव में 2014 को छोड़कर क्षेत्रीय दलों के कब्जे में रही. केरल की पलक्कड सीट पर 1996 से 2014 तक लोकसभा चुनाव में माकपा ने जीत दर्ज की थी.
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