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Home National उपराष्ट्रपति ने कहा – सामाजिक बुराइयां खत्म करने के लिए नये कानून से ज्यादा राजनैतिक इच्छाशक्ति जरूरी

उपराष्ट्रपति ने कहा – सामाजिक बुराइयां खत्म करने के लिए नये कानून से ज्यादा राजनैतिक इच्छाशक्ति जरूरी

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उपराष्ट्रपति ने कहा – सामाजिक बुराइयां खत्म करने के लिए नये कानून से ज्यादा राजनैतिक इच्छाशक्ति जरूरी

नयी दिल्ली : उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने सोमवार को कहा कि सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक कौशल अधिक महत्वपूर्ण हैं.

उन्होंने कहा कि महज नया कानून बना देने से अपराध नहीं रुकेगा या व्यवस्था नहीं बदलेगी. ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (बीपीआरडी) के 48वें स्थापना दिवस समारोह में मुख्य वक्ता के तौर पर अपने भाषण में नायडू ने 500 और 1000 के पुराने नोटों को चलन से बाहर करने के केंद्र सरकार के फैसले की भी सराहना की. उन्होंने कहा, ‘नये कानून के प्रति हमारी कमजोरी है और उसे पसंद करते हैं. कुछ भी होता है तो नया कानून लाने की मांग होती है, लेकिन क्या इससे सभी अपराध रुक जायेंगे.’ केंद्रीय पुलिस बल और गृह मंत्रालय के वरिष्ठ और शीर्ष अधिकारी इस मौके पर उपस्थित थे.

उन्होंने कहा, ‘मैंने अतीत में भी कहा था कि महज नया विधेयक पर्याप्त नहीं है. राजनैतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक कौशल की जरूरत है और तब आप सामाजिक बुराई को खत्म कर सकते हैं. सिर्फ कानून बना लेने से व्यवस्था नहीं बदलने जा रही है. उसकी जरूरत है, उससे मैं इनकार नहीं कर रहा हूं.’ वह महिलाओं के खिलाफ अपराध पर अंकुश लगाने और भ्रष्टाचार निरोध पर कानून में हालिया बदलावों और नये कानून बनाये जाने का उल्लेख कर रहे थे.

नायडू ने कहा कि नयी कानूनी पहल के जरिये प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे हैं. नोटबंदी के बारे में नायडू ने कहा कि इसे ‘सही मंशा’ से किया गया था और ‘बेडरूम, बाथरूम और तकिये के भीतर छिपाकर रखे गये सारे धन अब बैंकों में पहुंच गये हैं और व्यवस्था में आ गये हैं.’ नायडू ने उम्मीद जतायी कि आयकर विभाग और आरबीआई इस संदर्भ में तेजी से अपनी जांच करेगी और अपने निष्कर्षों को सार्वजनिक करेगी.

उपराष्ट्रपति ने सबको बैंक खाता प्रदान करनेवाली जनधन योजना की भी सराहना की. उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने इसका उपहास भी उड़ाया कि इसकी क्या जरूरत है, जब धन ही नहीं है. उन्होंने कहा कि जिन्होंने खाता खोला उन्होंने नोटबंदी के दौरान इसके महत्व को समझा. उन्होंने कहा, ‘इसके बाद नोटबंदी की आलोचना शुरू हो गयी. लोकतंत्र में वह नागरिकों का अधिकार है, लेकिन लोगों ने कहा कि सभी धन बैंकों में पहुंच गये तो क्या. वही लक्ष्य था. जो धन बेडरूम, बाथरूम और तकिये में था वह बैंकों में पहुंच गया है और व्यवस्था में आ गया है.’

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