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Home National पीएम नरेंद्र मोदी के लिए त्रिपुरा की जीत क्या पूर्वी भारत के फतह का आगाज है?

पीएम नरेंद्र मोदी के लिए त्रिपुरा की जीत क्या पूर्वी भारत के फतह का आगाज है?

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पीएम नरेंद्र मोदी के लिए त्रिपुरा की जीत क्या पूर्वी भारत के फतह का आगाज है?


पूर्वी भारत की 140 में 45 सीटों पर फिलहाल भाजपा का कब्जा है
लोकसभा चुनाव 2019 के लिए पूर्वोत्तर, ओडिशा, बंगाल अहम हैं

नयी दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में मिली पहली जीत से काफी उत्साहित हैं. यह जीत उनके लिए इस मायने में खास है किउनकेनेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार सीधे तौर पर किसी वाम किले को ध्वस्त किया है. भारतीय जनता पार्टी आज 20 राज्यों में शासन में है और यह दावा कर सकती है कि वह अखिल भारतीय पार्टी है. पर, हकीकत यह भी है कि दक्षिणी भारत व पूर्वी भारत में उसकी कमजोर पकड़ है. भारतीय जनता पार्टी की पूरी राजनीतिक बढ़त पश्चिमी व उत्तर-पश्चिमी राज्यों के भरोसे है. प्रधानमंत्री पूर्वोत्तर व पूर्वी भारत के विकास कीजरूरत को बार-बार अपने संबोधन में रेखांकित करते हैं, लेकिन यह भी सच है कि वे इस इलाके के राजनीतिक महत्व को भी समझते हैं. वे यह जानते हैं कि अगर 2019 में इन क्षेत्रों में बढ़त बना लेंगे तो उनकी जीत और प्रचंड हो सकती है या फिर दूसरी जगह की कमियों को कम से कम भर तो सकती है.

आज त्रिपुरा के मुख्यमंत्री के रूप में बिप्लव देव के शपथ लेने के बाद उन्होंने अपने संबोधन में भी कहा कि वे पूर्व के किसी भी प्रधानमंत्री से अधिक बार पूर्वोत्तर आये हैं. मोदी ने यह भी कहा कि त्रिपुरा की जीत की इतिहास में चर्चा होती रहेगी. उन्होंने कहा कि आज पूर्वोत्तर महसूस करता है कि शेष भारत उसकी चिंता करता है और भावनात्मक रूप से जुड़ा महसूस करता है.


पूर्वी भारत में भाजपा का क्या है हाल?

पूर्वी भारत के पश्चिम बंगाल, ओडिशा जैसे बड़े राज्यों मेंभाजपा की पकड़ अभी कमजोर है और उसे वहां काफी मेहनत करनी होगी. पूर्वोत्तर में 25, पश्चिम बंगाल में 42, ओडिशा में 21, बिहार में 40, झारखंड में 14 यानी कुल मिलाकर 140 लोकसभा सीटें हैं, जिसमें भाजपा अभी मात्र 45 सीटों पर काबिज है. इसमें उसके हिस्से सबसे अधिक 22 सीटें बिहार की, 12 सीटें झारखंड की, सात सीटें असम की हैं. इसके अलावा पश्चिम बंगाल में दो आसनसोल वदार्जिलिंगव ओडिशा की एक सीट शामिल है. भाजपा के पास पूर्वोत्तर में एक सीट अरुणाचल में गृह राज्य मंत्री किरण रिजेजू की भी है. यानी आप अगर सिर्फ पूर्वी भारत की सीटों की कसौटी पर भाजपा को कसेंगे तो पाएंगे कि वह इस इलाके में बहुमत में नहीं है.


पश्चिम की बढ़त पर सवाल और पूरब की जरूरत

भाजपा ने पिछले बार पश्चिम राज्यों गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल सहित उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में अधिकतम सीटें हासिल कीं, जहां अब उससे आगे बढ़त की कोई संभावना नहीं है, बल्कि उसमें कमी आने की ही संभावना है, क्योंकि उन राज्यों में वह चुनावी सफलता का चरम था. महाराष्ट्र भी सहयोगी शिवसेना के साथ उसने शानदार परिणाम हासिल किये थे, लेकिन शिवसेना अब उससे बेहद खफा है. भाजपा के चुनावी रणनीतिकार इन बातों से अच्छे से वाकिफ हैं. इसलिए अमित शाह ने दक्षिण भारत व पूर्वी भारत में अपनी पूरी ऊर्जा झौंकी है. वे केरल-कर्नाटक की लगातार यात्रा करते हैं और पश्चिम बंगाल में आदिवासी परिवार के यहां खाना खाते हैं. पूर्वी भारत में झारखंड और असम को छोड़ दें तो बिहार जैसे बड़े राज्य में भी उसे हमेशा अच्छे प्रदर्शन के लिए मजबूत क्षेत्रीय सहयोगी की जरूरत होती है. चाहे वे नीतीश कुमार हों या फिर रामविलास पासवान-उपेंद्र कुशवाहा.

ओडिशा, पश्चिम बंगाल व पूर्वोत्तरसेउम्मीदें

पिछले दिनों वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण जेटली से एक इंटरव्यू में यह सवाल पूछा गया था कि पश्चिम व उत्तरी भारत के राज्यों में उन्होंने अधिकतम सीटें जीत ली थी,और वहआंकड़ा अबऔर ऊपर नहीं जा सकता, बल्कि नीचे जाने का ही खतरा है तो वे 2019 मेंवैसीकमी होने की स्थितिमें बढ़त कहां से हासिल करेंगे? इस सवाल के जवाब में उन्होंने दो राज्यों का प्रमुखता से नाम लिया था ओडिशा और पश्चिम बंगाल. इसके अलावा दक्षिण का भी जिक्र किया था. ओडिशा की 21 सीटों में भाजपा ने भले पिछली बार एक ही सीट जीती थी लेकिन वह 10 सीटों पर बढ़त बनाने में सफल रही थी. पश्चिम बंगाल में भी भाजपा लगातार वोट प्रतिशत बढ़ाने में कामयाब हो रही है और ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई में वह वाम मोर्चा की जगह हासिल कर लेगी. भाजपा के लिए पूर्वोत्तर, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में बढ़त बनाना व बिहार-झारखंड में पुरानी स्थिति को कायम रखना बहुत जरूरी है.

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