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Home National यह डेरा की सफलता नहीं, आंबेडकरवादी-समाजवादी-समतावादी राजनीति की असफलता है: सोशल मीडिया

यह डेरा की सफलता नहीं, आंबेडकरवादी-समाजवादी-समतावादी राजनीति की असफलता है: सोशल मीडिया

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यह डेरा की सफलता नहीं, आंबेडकरवादी-समाजवादी-समतावादी राजनीति की असफलता है: सोशल मीडिया

नयी दिल्ली: रेप केस के आरोप में शुक्रवार को डेरा सच्चा सौदा प्रमुख बाबा राम रहीम को सीबीआई की विशेष अदालत की ओर से दोषी करार दिये जाने के बाद उनके समर्थकों द्वारा किये गये हिंसक प्रदर्शन की खबरें जहां मीडिया में जोर-शोर से छाया रहा, वहीं सोशल मीडिया पर भी इसकी गर्मजोशी के साथ चर्चा की गयी. सोशल मीडिया में फेसबुक डेरा सच्चा सौदा के अपार समर्थकों का पंचकूला में हुए जुटान पर दिल्ली के एक स्वतंत्र पत्रकार दिलीप सी मंडल ने लिखा है कि यह डेरों की सफलता नहीं, आंबेडकरवादी-समाजवादी- समतावादी राजनीति की असफलता है.

हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में हर तीसरा आदमी एससी है

उन्होंने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि हरियाणा, पंजाब और साथ लगे राजस्थान का हिस्सा सामाजिक आंदोलनों की दृष्टि से बंजर साबित हुआ है. मंडल ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि यह देश में अनुसूचित जाति की सबसे सघन आबादी वाला इलाक़ा है. इन इलाकों में हर तीसरा आदमी एससी है. यहां समाजवादी आंदोलन कभी नहीं पनप सका. मंडलवादी-समतावादी राजनीति से भी यह इलाका अछूता रहा.

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बीएसपी का उभार क्षणिक साबित हुआ

बीएसपी का यहां का उभार भी क्षणिक साबित हुआ. बाकी का आंबेडकरवादी आंदोलन भी सीमित ही रहा. उन्होंने लिखा है कि ऐसे में जनता के पास कोई सपना नहीं बचा. कोई भी नहीं था, जो बेहतर समाज का सपना दिखाए. इसी शून्य में नीचे की जातियां डेरों की शरण में चली गयी. यहां का भाग्यवाद उन्हें सुकून देता है. साथ बैठकर प्रवचन सुनना ही इनका एंपावरमेंट है.

ब्राह्मणों का अपना मंदिर है

दिल्ली सी मंडल ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि कोई ब्राह्मण तो डेरों में जाता नहीं है. उनका तो अपना मंदिर है. डेरा नीची की जातियों के लोगों के लिए हैं. हालांकि, कोई भी बाबा नीचे की जातियों का नहीं है. ये बाबा चुनाव के समय जनता को इस या उस पार्टी को बेच देते हैं. जनता के पास विकल्प क्या था?

जिसने विकल्प दिया, लोग उसके पास चले गये

दिलीप सी मंडल लिखते हैं कि जिसने विकल्प दिया, लोग उसके पास चले गये. आंबेडकरवादियों ने जमीन खाली कर दी, बाबाओं ने पकड़ ली. जनता के पास आंबेडकरवादी विकल्प था कहां? इसलिए डेरा भक्तों को दोष मत दीजिए. उन्होंने लिखा कि यह समाजवादी-आंबेडकरवादी राजनीति की असफलता का साइड इफेक्ट है. समाजवादी-आंबेडकरवादी सपनों के बिना समाज का डेरा बन जाता है. वहां ऐसे लोग राज करते हैं.

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