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Home लाइफस्टाइल सर्वे: घरेलू हिंसा की शिकार औरतें जल्द खो देती हैं अपनी संतान

सर्वे: घरेलू हिंसा की शिकार औरतें जल्द खो देती हैं अपनी संतान

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सर्वे: घरेलू हिंसा की शिकार औरतें जल्द खो देती हैं अपनी संतान

विकासशील देशों में किये गये सर्वे से पता चला है कि अपमानजनक स्थिति में पैदा हुए बच्चे पांच साल की उम्र तक पहुंचने से पहले ही मर जाते हैं, लेकिन अगर उन्हें ऐसे माता-पिता से दूर रखा जाये, तो वे बेहतर जीवन जी सकते हैं.

नेशनल कंटेंट सेल
दुनिया भर के 81 देशों की एक तिहाई महिला घरेलू हिंसा से पीड़ित हैं. इसके कई प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव से उनका घर व परिवार भी प्रभावित होता है. विकासशील देशों में घरेलू हिंसा की जानकारी के लिए डोमेस्टिक एंड हेल्थ सर्वे ने 90 से अधिक विकासशील देशों में 300 से अधिक सर्वेक्षण किये.

फिलहाल 32 विकासशील देशों के 48 सर्वेक्षणों का विश्लेषण प्रकाशित किया गया है. यह सर्वे वर्ष 2000 और 2014 के बीच किया, जिसमें घरेलू हिंसा पर एक प्रश्नावली भी शामिल किया गया था. सर्वेक्षण के लिए 18 से 49 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं का साक्षात्कार लिया गया. इसके साथ ही इस दौरान उत्तरदाताओं के बच्चों के जन्म और मृत्यु के आंकड़ों का भी लेख-जोखा किया गया. घरेलू हिंसा का बच्चों पर होनेवाले प्रभाव के बारे में जानने के लिए सर्वे में वर्ष 1975 से 2013 के बीच पैदा हुए करीब 0.8 मिलियन बच्चों के नमूनो का विश्लेषण किया गया. इससे पता चला कि बच्चों की मौत के कई कारण हैं.

यह माता पिता की शिक्षा, मां की उम्र, बच्चे का लिंग, स्थान और देश पर भी निर्भर करता है. सर्वे में पाया गया कि जिन परिवारों में घरेलू हिंसा होती है. वहां 0.4 प्रतिशत बच्चे 30 दिन को अंदर मर जाते हैं. ऐसे घरों में 0.7 प्रतिशत बच्चों की मौत एक साल के अंदर हो जाती है तथा 1.1 प्रतिशत बच्चों की मौत पांच साल के अंदर हो जाती है. नवजात मृत्यु दर के मामले में, अगर गर्भवती होने पर माता घरेलू हिंसा के दौरान शारीरिक रूप से प्रताड़ित की जाती है तो बच्चे का स्वास्थ्य सीधे प्रभावित हो सकता है. यह भी संभव है कि घरेलू दुर्व्यवहार के शिकार महिला को उचित स्वास्थ्य देखभाल या पर्याप्त पोषण न मिलता हो और उनसे जन्म लेनेवाले बच्चे जन्म से पूर्व कुपोषित होते हैं. जन्म के बाद इनका अपंग होना या कम वजन का होना आम समस्या है. अपमानजनक माहौल में बढ़ रहे बच्चों के स्वास्थ्य भी घरेलू हिंसा से प्रभावित होता है. जिससे शिशु को पीड़ित माताओं से जन्म के बाद स्वास्थ्य देखभाल और पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता.

कानून बने, लेकिन प्रभावी नहीं हुए

विकासशील 72 देशों में वर्ष 1993 से 2013 के बीच घरेलू हिंसा रोकने के लिए कई कानून बनाये गये लेकिन इस कानूनों का जमीनी स्तर पर लागू नहीं हुआ. उदाहरण के लिए कंबोड़िया में वर्ष 2005 में घरेलू हिंसा को रोकने के लिए कानून बना. जिसके अंतरगत इस प्रकार की हिंसा को अपराध घोषित किया गया. लेकिन कंबोडियन एनजीओ कमेटी द्वारा एक रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के बीच कानूनों के बारे में जागरूकता की कमी, घरेलू हिंसा की रिपोर्ट करने या अपने दुर्व्यवहारियों से बचने के इच्छुक महिलाओं के लिए सीमित आधारभूत ढांचे को अप्रयाप्त बताया गया है. सर्वे में घरेलू हिंसा से प्रभावित बच्चों के आंकड़े जांचने के लिए डेवलपमेंट सेंटर सोशल इंस्टिट्यूशन एण्ड जेंडर इंडेक्स (ओइसीडी) का प्रयोग किया गया. सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि घरेलू हिंसा वहन करनेवाली माता व बाल मृत्यु दर के बीच एक मजबूत संबंध है.

कानून जमीनी स्तर पर करें काम, तो कम होगी घरेलू हिंसा

शोध के परिणामों से पता चला कि घरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं को सही समर्थन करनेवाला एक मजबूत कानूनी ढांचा मिले तो घरेलू हिंसा की घटनाओं को कम किया जा सकता है. यह दुनिया पहले से भी जानती है कि वैश्विक स्तर पर बड़ी संख्या में महिलाएं घरेलू हिंसा कि शिकार हैं. वे आर्थिक, मानसिक और शारीरिक रूप से पीड़ित हैं लेकिन हमारे शोध से यह स्पष्ट हुआ कि इसका नुकसान उनके बच्चों को उठाना पड़ता है. विशेष रूप से, यह विकासशील देशों में आनेवाली पीढ़ियों को प्रभावित करता है. इस बीच अच्छी खबर यह है कि अगर घरेलू हिंसा को रोकने के लिए कानूनी प्रतिबंध को जमीनी स्तर पर लगाया जाये तो महिलाएं घरेलू हिंसा से बच सकती हैं. इससे न केवल महिलाओं का जीवन सुधरेगा. बल्कि, उनके बच्चों के लिए भी यह बेहतर होगा.

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