[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home लाइफस्टाइल अपनेपन से सींचें बगिया परिवार की

अपनेपन से सींचें बगिया परिवार की

0
अपनेपन से सींचें बगिया परिवार की
वीना श्रीवास्तव
एक पत्नी, पति से कहती है- ‘मां ने तो जीना मुहाल कर रखा है. जब देखो चश्मा बनवाने की जिद करती रहती है. अभी मुझे अपनी मां से मिलने चंडीगढ़ जाना है. वहां भइया-भाभी ने मुसीबत कर रखी है. अब मैं यहां देखूं या अपनी मां के पास जाऊं. चश्मे में ही हजार खर्च हो गये तो मेरा किराया कैसे निकलेगा?’ बेटा गुस्से से मां से कहता है- ‘क्या मां, तुम्हें चश्मे की पड़ी है. आखिर तुम करती क्या हो ? जो तुम्हें चश्मे की जरूरत है. कितने खर्च हैं.
पहले वो देखूं या चश्मा बनवाऊ !’ मां ने कहां- ‘तेरी सूरत में मुझे मोहन दिखते हैं. कबसे तेरा चेहरा नहीं देख पायी. यही तो जिंदा रखता है मुझे. चश्मा ठीक हो जायेगा तो बहू की भी दाल-चावल बीनने में मदद कर दूंगी. वह अकेली काम करती है.’ यह सुन कर बेटे की आंखें नम थीं. वह रुंधे गले से बोला- ‘मुझे माफ कर दो मां. आखिरी बार, प्लीज !’ मगर बच्चों की गलतियां कभी आखिरी नहीं होतीं.
मानव जीवन को फलने-फूलने के लिए परिवार रूपी बगिया की हमेशा जरूरत रही है. जैसे कोई भी बगिया विभिन्न फूलों के बिना बगिया नहीं कहलाती, वैसे ही बिना परिवार मानव जीवन के फलने-फूलने की कल्पना भी नहीं की जा सकती. कुछ वर्षों पहले हमारे दादी-बाबा, चाचा-बुआ साथ रहते थे.
शादी के बाद गरमी की छुट्टियों में छोटी-बड़ी बुआ आती थीं. हम भी ननिहाल जाते थे. वहां मौसी-मामा से मिलते थे. धीरे-धीरे यही नन्हे पौधे पेड़ बनते हैं और फिर वृक्ष. वे वृक्ष जो सभी को छांव देते हैं. वैशाख-ज्येष्ठ की झुलसती-तपती दोपहरी में वे वृक्ष हमें अपने आंचल में छुपाते हैं. पसीने से तर-बतर बदन को हवा के मखमली स्पर्श से सुखाते हैं.
बारिशों में अपनी बाहों की झीनी छतरी फैला कर हमें तेज बूदों से बचाते हैं. सर्दियों में जब तेज, चमचमाती, चटक धूप हमसे सहन नहीं होती तब वृक्षों के आंचल से छनकर आती धूप हमें गरमाहट तो देती है, साथ ही धूप की तेजी को मद्धम कर देती है. आज हम जितनी परेशानियां झेल रहे हैं, वे केवल इसलिए कि हमने उनका महत्व नहीं जाना और उनको अंधाधुंध काटा. ठीक वैसे ही जैसे हम अपने घर के बुजुर्गों से दूर जा रहे हैं.
माना कि बस्तियां बसाने के लिए वृक्षों का कटान किया जा रहा है, तो क्या हम घरों में, सड़कों किनारे और पेड़ नहीं लगा सकते? जब हम जंगल काटते हैं तो नये पौधे लगाते क्यों नहीं. ठीक उसी तरह जिस तरह आज नौकरी, पढ़ाई और बेहतर भविष्य के लिए बच्चे बाहर जा रहे हैं. यह मजबूरी बच्चों और पेरेंट्स दोनों की है. वरना बेहतर भविष्य कैसे बनेगा? सबके सपने कैसे पूरे होगे? आप बच्चों को कैसे आकाश में उड़ता देखेंगे? ये सब हमें सीमित साधनों में करना है. सीमित साधन नहीं, बल्कि सीमित अवसरों में ही तीनों पीढ़ियों में नजदीकी रखनी होगी.
नयी राह है सबकी जरूरत
आज इस मुद्दे के मायने नहीं कि एकल परिवार बेहतर है कि संयुक्त परिवार. न ही इस पर बहस की गुंजाइश है. कुछ दशकों पहले जब बच्चे घर से दूर जाने लगे तो इस ओर सबकी नजर गयी. समाजशास्त्रियों ने परिवार विघटन को बड़ी घटना माना और यह थी भी. कुछ विवशतावश और कुछ उज्जवल भविष्य की खातिर. आज हालात यह है कि माता-पिता को आशंका नहीं, बल्कि विश्वास है कि विवाह के बाद बेटा अलग रहेगा. अगर हम उन स्थितियों-परिस्थितियों पर नजर डालें तो हम सब विकास के बढ़ते चक्र में घूम रहे थे. जब भी कोई भीड़ से निकलकर विपरीत दिशा चुनता है तो सबकी निगाहें उसपे जम जाती हैं.
जैसे-जैसे विपरीत दिशा का कारवां बढ़ेगा, विश्लेषक उसके अच्छे-बुरे परिणाम गिनायेंगे और यह बहस का मुद्दा बन जाता है. मगर जब सभी दिशा बदल लेंगे तो पहलीवाली भीड़ ही विपरीत राह की राही कहलायेगी, क्योंकि नयी राह सबकी जरूरत है. हम इस बात से इत्तेफाक रखें या न रखें, चलना तो इसी रास्ते पर है.
संबंधों के दूध को फटने से बचाएं
परिवार बच्चों की पहली पाठशाला और मां पहली गुरु है, यह सत्य है और हमेशा रहेगा. इसलिए आज की जरूरतों के मुताबिक अगर बच्चों को दूर रहना पड़ रहा है तो पोते-पोतियों को दादी-बाबा से मिलवाने का प्रयास होना चाहिए. पहले गर्मियों की छुट्टियां होते ही बच्चे परिवारवालों से मिलने को उत्सुक रहते थे. आजकल पेरेंट्स हॉबी क्लासेस ढूंढ़ते हैं.
बेहतरी के लिए कोचिंग क्लासेस करवाते हैं. दूसरे राज्य-देश जाने की प्लानिंग करते हैं. यह भी खराब नहीं. बच्चे दूसरे शहर घूमें, उनको जाने, अच्छा है, लेकिन कृपया कुछ दिनों के लिए ही सही बच्चों को अपने परिवार से मिलाने जरूर ले जाइए. गांव भी घुमाइए. सबसे रोचक बात यह सामने आयी है कि लोग बेटी के सिर पर यह सेहरा बांधते हैं कि अंतत : बेटियां ही पेरेंट्स के काम आती हैं. वही बुढ़ापे का सहारा हैं. माता-पिता भी तारीफों के पुल बांधते नहीं आघाते कि वक्त-बेवक्त उनके बेटी-दामाद ही उनके काम आये. बेटे-बहू ने हाल तक नहीं पूछा. लोग मानते हैं विवाह के बाद बहू दूसरी और बेटा तीसरा हो जाता है.
क्या बेटी-दामाद की तारीफ करनेवाले पेरेंट्स अपनी बेटी से यह कहते हैं कि जितना तुम हमारा ध्यान रखती हो, उतना या उससे ज्यादा अपनी ससुरालवालों का भी रखो. क्या आपकी बेटी-दामाद किसी के बेटा-बहू नहीं हैं ? क्यों सबको बेटी-दामाद अच्छे लगते हैं ? क्यों बहू-बेटा से ही पेरेंट्स को शिकायत होती है ? इसकी स्प्ष्ट वजह है बेटी का बहू बनने के बाद भी सास-ससुर को माता-पिता के रूप में न देखना. बेटा भी पत्नी की खुशी और ससुराल में दामाद से बेटे का तमगा पाने के लिए ससुरालवालों का खास ध्यान रखता है.
बहू बनी बेटी मायके की जरा-सी परेशानी में विह्वल हो जाती है. इसमें कुछ गलत नहीं, बल्कि स्वाभाविक है मगर जरूर गलत है कि जब ससुराल में आपकी जरूरत हो उस समय आप आंख चुराएं, तब खटास तो आयेगी ही. हमेशा मायके का गुणगान, ससुराल की कमी निकालना और हर घड़ी ससुराल की मायके से तुलना करना परिवार में खटास लाती हैं. खटास आने से दूध तो फटेगा ही. दूध एक बार फट गया तो दूध नहीं बनेगा. दूध वह आहार है जो जन्म लेते ही बच्चे की जरूरत होता है और बुढ़ापे तक उसकी उपयोगिता कम नहीं होती. संबंधों के इस दूध को फटने से बचाइए.
रिश्तों में यह दोहरा मानदंड क्यों
जीवन के विभिन्न चरणों में खुद को उसके अनुरूप ढालिए. जब आपका बेटा अपने पिता को बेहतर बेटा नहीं, दामाद बनते देखेगा तो क्या वह आपका फरमाबरदार बन पायेगा? अगर बेटा ससुराल की आवभगत में अपने परिवार को भूल जाये तो जब कल आपको अपने बेटे की जरूरत होगी तो वह भी आपको भूलकर अपनी ससुराल के बाहर खड़ा मिलेगा. बहुत से घर ऐसे हैं जहां बूढ़े मां-पिता की याद तब आती है जब घर कोई नन्हा मेहमान आनेवाला होता है. वह माता-पिता को बच्चे की देखभाल के लिए बुलाते हैं. उसमें भी वे खुश रहते हैं.
मगर जब बूढ़े पेरेंट्स को आपकी जरूरत होती है तो यह कहकर वापस भेज देते हैं कि कौन ध्यान रखेगा, जब हम दोनों जॉब में हैं. हमें याद रखना चाहिए कि उन्होंने हमें जन्म ही नहीं दिया बल्कि खुद कम निवाले खाकर, अभावों में रहकर हमारी जरूरतें पूरी कीं. बड़े बच्चे माता-पिता की चप्पल से लेकर कपड़ों तक पर कब्जा जमा लेते हैं. घर में अपनी पसंद का खाना खानेवाले बच्चे नहीं जानते कि मां को क्या पसंद है और पेरेंट्स उनकी रग-रग से वाकिफ होते हैं क्योंकि वे बच्चों को पालते-पोसते हैं.
नन्हा शिशु भूख से रो रहा है या अन्य पीड़ा से, मां बखूबी समझती है. वह बारिश में भीगते बच्चे की आंखों से छलकते आंसू देख लेती है. उसी मां को जॉब के नाम पर दूर रखना क्या सही है? एक बेटी मां के आंसू तुरंत देख लेती है, मगर वही सास के आंसू-तकलीफ क्यों नहीं देख पाती? दामाद को सास की पीड़ा का एहसास होता है जिसने उसे जन्म नहीं दिया, मगर उस मां की पीड़ा क्यों नहीं दिखाई देती जिसने उसे जन्मा. मां भी बड़े गर्व से कहती है कि उसका दामाद बेटी का बहुत ध्यान रखता है. वहीं बेटा, बहू का ध्यान रखे तो मां कहती है मेरी बहू ने तो बेटे को कब्जे में कर लिया. यह दोहरा मानदंड क्यों? अगर बहुएं बेटी बन कर सुसराल में रहें, साथ ही जरूरी यह भी है कि सभी सास अपनी बहुओं को वही प्यार दें, जो वो बेटी को देती हैं तो मुझे पक्का यकीन है कि फिर ये नहीं कहा जायेगा कि माता-पिता का ख्याल केवल बेटी-दामाद रखते हैं.
ताकि महकते, फलते-फूलते रहें रिश्ते
यह सच है कि जहां बेटियां पली-बढ़ीं, उनकी तकलीफ से बहुत कष्ट होता है, मगर जहां उनको नया परिवार बसाना है, वहां के रिश्तों को भी उन्हें प्यार से सींचना है. जैसे फूल के पौधे लगाने के लिए हम पहले जमीन तैयार करते हैं. उसकी सिंचाई, गुड़ाई और खाद डालते हैं. पौधे सूखें नहीं, इसलिए रोज सींचते हैं, तभी खूबसूरत, स्वस्थ, प्यारे फूल खिलते हैं.
इसी तरह परिवार को भी प्यार, सहयोग व अपनेपन से सींचना होगा, ताकि वह घना वृक्ष बने और मुसीबत के समय साया बन कर हमारे साथ खड़ा रहे. अगर हमारे बच्चे हमें फर्क करते देखेंगे तो कल वे भी वही सुलूक करेंगे जो आज हम कर रहे हैं. परिवार हमारे समाज की सबसे छोटी मगर सबसे मजबूत इकाई है. जब परिवार समृद्ध होगा तभी समाज भी आगे बढ़ेगा और जब समाज समृद्ध होगा, तो देश तो उन्नति करेगा ही.
आसान उपायों से दूर करें त्वचा की समस्याएं
बिना संसाधन गांव की लड़कियों को बना रहीं हुनरमंद
अंगरेजी पढ़ने में हेल्प करेगा गूगल का ‘ट्रांसलेट’ एप
गर्ल्स को भा रहे कार्टून प्रिंट्सवाले टी-शर्ट
इस समर सीजन में कार्टून प्रिंट्सवाले टी-शर्ट गर्ल्स के बीच काफी पसंद किये जा रहे हैं. वेस्टर्न आउटफिट्स में ही नहीं, बल्कि एथनिक ड्रेसेज में भी इनका फैशन है.
मौसम गरमी का है और इसमें हल्के-फुल्के कपड़े ही बॉडी को शूट करते हैं. इसमें भी कार्टून प्रिंट्सवाले टी-शर्ट इन दिनों गर्ल्स के बीच काफी पॉपुलर हो रहे हैं. हाल में कई बॉलीवुड सेलेब्रिटीज, जैसे-कैटरीना कैफ, जरीन खान इन कार्टून कैरेक्टर्स वाले टी-शर्ट्स में नजर आयी हैं. इसके बाद से इसका ट्रेंड चल पड़ा है.
कई कलर ऑप्शन : कार्टून कैरेक्टर प्रिंट्स के साथ कई कलर कॉम्बिनेशन नजर आ रहे हैं. हालांकि ब्लैक में यह काफी हॉट लगता है, लेकिन ब्लू, ऑरेंज, येलो और ग्रीन कलर के आउटफिट्स में भी कार्टून प्रिंट्स को मिक्स मैच किया जा सकता है. गर्ल्स इन्हें कैजुअल आउटफिट्स के तौर पर पंसद कर रही हैं. कॉलेज और आउटिंग के दौरान भी वे इन्हें कैरी कर रही हैं.
ट्रेडीशनल में भी हिट : कार्टून प्रिंट्स सिर्फ वेस्टर्न आउटफिट्स में ही नहीं, बल्कि एथनिक या ट्रेडिशनल ड्रेसेज में भी पसंद किये जा रहे हैं. साड़ी और सलवार सूट में भी इस तरह के प्रिंट्स देखे जा सकते हैं. ये ड्रेसेज ट्रेडिशनल होने के बावजूद अलग ही लुक देते हैं.
बैग्स और फुटवियर्स भी : लोगों की पसंद और डिमांड को देखते हुए अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस गरमी के मौसम में ये प्रिंटेड टी-शर्ट्स हॉट फैशन रहेंगे. कई कंपनियां कार्टून प्रिंट्स को लेकर एक्सेसरीज की नयी रेंज मार्केट में उतार रही हैं, जो काफी अट्रैक्टिव हैं. इनमें बैग्स और फुटवियर्स भी शामिल हैं. इस तरह के कलेक्शन फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसी शॉपिंग साइट पर भी मौजूद हैं.
ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel