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समाज के लिए कोढ है दहेज प्रथा

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समाज के लिए कोढ है दहेज प्रथा

अनु मिश्रा

21वीं सदी में विकासशील भारतीय समाज में भी अनेक पिछड़ी परंपराएं जीवित हैं. आधुनिकता का दम भरनेवाले इस समाज में अभी भी कई ऐसी परंपराएं जोंक की तरह चिपकी हुई हैं, जो समाज को बीमार कर रही हैं. दहेज प्रथा हमारे देश के लिए एक कलंक है, जो कि दिन-ब-दिन कम होने के बजाय महामारी की तरह बढ़ता ही जा रहा है. वर्तमान में यह किसी आतंकवाद से कम नहीं है. सदियों से पुरुष प्रधान देश होने के कारण भारत में महिलाओं का शोषण होता रहा है. दहेज प्रथा भी उसी शोषण का एक रूप है.

वास्तव में दहेज के पीछे समाज के भौतिकवादी संस्कृति काम करती हैं. वर पक्ष द्वारा एक ही झटके में धनी बन जाने और वधू पक्ष की तुलना में खुद को उच्चतर दिखाने की भौतिकवादी लालसा ने समाज में अनेक बुराइयों को जन्म दिया है. दहेज भी उनमें से एक है. अब लोगों ने इसको एक परंपरा का रूप दे दिया है जिसके कारण लोगों को लगता है कि दहेज देना अनिवार्य है. इसके खिलाफ भारत सरकार ने कई कानून बनाये हैं, लेकिन सही तरीके से उनका पालन नहीं होने के कारण यह प्रथा अब तक समाज में मौजूद है.

हमारे समाज में किसी लड़की की शादी के समय लड़की के परिवार वालों के द्वारा लड़के या उसके परिवार वालों को नकद या किसी भी प्रकार की कीमती चीजें देने को दहेज कहा जाता है. इसका अर्थ लड़के के परिवारवालों द्वारा लड़के का मूल्य वसूलना भी समझा जा सकता है. दहेज प्रथा एक सामाजिक समस्या है. गैर कानूनी होने के बावजूद भी हमारे समाज में खुले तौर पर इसका राज कायम है. महात्मा गांधी जी ने भी दहेज प्रथा को एक कलंक बताया है. उन्होंने अपनी एक पुस्तक में लिखा है- ”जो भी व्यक्ति दहेज को शादी की जरूरी शर्त बना देता है, वह न केवल अपनी शिक्षा और अपने देश की बदनामी करता है, बल्कि पूरी महिला जाति का भी अपमान करता है.” हम सबको मिल कर इसके खिलाफ आवाज बुलंद करनी होगी.

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