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चैत माह में चैता सुने बिना अधूरा है लोक जीवन

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चैत माह में चैता सुने बिना अधूरा है लोक जीवन

रविशंकर उपाध्याय
पटना :
चैत माह में विशेष शैली में गाया जाने वाला गायन चैता सुने बगैर बिहार में लोक जीवन की कल्पना मुश्किल है. चैता बिहार की विशिष्ट पहचान है. इनमें शृंगार के साथ करुण रस व मार्मिक व्यथाओं का समावेश होता है. यह लोकछंद युक्त होते हैं और इसका गायन एकल और सामूहिक दोनों रूपों में होता है. यह गीत ठुमरी गायिकाओं में ज्यादा लोकप्रिय होकर उनके द्वारा उप शास्त्रीय जामा में गाये जाने के कारण लोकप्रिय बन गया. चैता का चलन मगध और भोजपुर क्षेत्रों में अधिक है. चैत महीने को ऋतु परिवर्तन के रूप में जाना जाता है. पतझड़ बीत चुका होता है और वृक्षों और लता में नयी कोपलें आ जाती है.

चैत महीने में राम का जन्मोत्सव होने के कारण राम का वर्णन चैता गीतों में तो आता ही है परंतु कई गीतों में कृष्ण और राधा के विरह का भी जिक्र है. इन गीतों में शिव पार्वती के भी संवाद कर्णप्रिय लगते हैं. ढोलक आैर झाल पर गाया जाने वाला चैता गायन गोलाकर, मंडलाकार एक या दो घेरे में बैठकर गाया जाता है. मंडली के मध्य में वादक, मुख्य रूप से ढोलक बजाने वाला या उनके सहयोगी अन्य नाल आदि बजाने वाले बैठते हैं. वृत की परिधि पर सहयोगी गायकगण झाल, करताल आदि के साथ बैठते हैं. वादक एवं गायकों के बीच इतनी दूरी रखी जाती है कि एक या दो स्त्री वेशधारी नर्तक सुविधापूर्वक मंडलाकार दायरे में नृत्य कर सकें. इस नर्तक को देेहाती क्षेत्रों में आदरपूर्वक जोगिन कहते हैं. परिधि पर बैठे हुए लोगों में से कोई एक व्यक्ति गायन का संचालन करता है. यह कोई जरूरी नहीं है कि कोई एक व्यक्ति ही मंडलाधिपति हो या गायन-समूह का प्रधान हो.

चैत्य शब्द से बना चैता

चैता शब्द संस्कृत के चैत्य से बना है. चैता पर अध्ययन करने वाले रवींद्र कुमार पाठक कहते हैं कि चैत्य देवगृह को कहते हैं, जिसमें भगवान बुद्ध के किसी स्वरूप अथवा बौद्ध परंपरा में स्वीकृत किसी देवता-विशेष की प्रतिमा स्थापित हो. यदि चैत में गाये जाने वाले लोकभाषा में निबद्ध चैता के पदों को देखें तो उनमें वाच्य-वाचक संबंध बहुत कम हैं. मूलतः वे स्वरूपात्मक हैं. चैता के पदों में स्वरूप ही प्रधान है. एक पद है, आज चइत हम गाइब हो रामा.. यह पूर्णतः संकल्पात्मक है. इस पद का अर्थ है कि आज मैं इस स्थान पर चैता गायन करूंगा. चैता पदों के लिए उसकी गायन शैली ही प्रमुख होती है. फागुन वसंत का प्रारंभ है. चैत वसंत की प्रौढ़ावस्था है. मनुष्य के भाव में वसंत में रति का प्रवाह अपने चरम पर होता है इसलिए चैता गायन में कठोरता होती है. आलाप के साथ आरोह की ओर गायक बढ़ते हैं लेकिन अवरोह की कोई व्यवस्था नहीं होती है. दोगुन, तिगुन और चौगुन में संपूर्ण गायक एवं श्रोता समूह मंत्रमुग्ध हो जाते हैं. देशकाल का बोध उस क्षण ठहर जाता है, मन में चंचलता मिट जाती है और चरम पर पहुंचने के बाद जब एक बार हा ध्वनि के साथ विराम किया जाता है तो थोड़ी देर के लिए व्यक्ति का मन स्वतः चंचलता से रहित हो जाता है.

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