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अपने बच्चों को समझाएं रुपये की अहमियत

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अपने बच्चों को समझाएं रुपये की अहमियत

वीना श्रीवास्तव

साहित्यकार व स्तंभकार

इ-मेल : veena.rajshiv@gmail.com, facebook.com/veenaparenting, twitter @14veena

परिवार वह प्रारंभिक पाठशाला है जहां एक बेहतर नागरिक, बेहतर इंसान का आधार तैयार होता है. अगर हम उस पाठशाला में बच्चों को ठीक से न समझा सकें, उसमें सामान्य समझ, सही- गलत का फर्क आंकने की क्षमता न पैदा कर सकें, उसमें संवेदनशीलता, इंसानियत, सभ्य नागरिक के गुण न भर सकें, तो फिर कोई भी स्कूल यह गारंटी नहीं ले सकता कि वह आपके बच्चे को इन बातों के प्रति जागरूक करेगा.

वह स्कूल आपके बच्चे को शिक्षित तो करेगा, हो सकता है पढ़ाई में आपका लाडला अव्वल रहे, मगर पढ़ा-लिखा होने के बावजूद उसमें समझदारी, संस्कार, मानवता नहीं होगी. वह बच्चा किताबी ज्ञान में तो पारंगत होगा, मगर व्यावहारिक ज्ञान उसमें नहीं के बराबर होगा. अच्छी शिक्षा से हम अच्छा भविष्य तो बना सकते हैं, कमा सकते हैं, लेकिन सामाजिक प्राणी के तौर पर हम जीवन में असफल रहते हैं.

बच्चा अपने जीवन में आनेवाली परेशानियों से खुद जूझकर ही सीखेगा, लेकिन किसी का व्यवहार बहुत जल्दी नहीं बदलता. इफरात खर्च करने वाला व्यक्ति अपने खर्च पर कभी कंट्रोल नहीं कर पाता, यदि करेगा तो रोकर यह कहते हुए कि उसकी किस्मत में यही लिखा है. आज बच्चों में खर्च की आदत डालने के बारे में बात करते हैं.

आमतौर पर हम सभी बच्चों को घुमाने ले जाते हैं. नन्हे बच्चों को भी शौक होता है और वे रोते भी इसीलिए हैं क्योंकि लेटे-लेटे एक एंगल से देखते- देखते बोर हो जाते हैं, साथ ही उनका शरीर भी दुखता है. जब आप उन्हें लेकर निकलते हैं तो उससे उन्हें आराम मिलता है.

बच्चा बाजार में विभिन्न तरह की चीजें देखकर चुप हो जाता है. यह भी होता है कि पार्क के अलावा सुबह दूध, ब्रेड या कुछ और लेने गये तो बेटे या बिटिया को भी ले गये. यह अच्छी बात है.

जब वह थोड़ा- सा समझदार हो जाये तो आप जब भी कोई सामान खरीदें, तो रुपये अपने बच्चे से दिलवाएं. उसे बताएं कि कोई भी चीज जब हम खरीदते हैं, तो वह बिना रुपये के नहीं मिलती.

जब हम रुपये देंगे तभी दुकान वाले अंकल हमें सामान देंगे और अगर हमारे पास उतने रुपये नहीं हैं, तो वह हमें सामान नहीं देगा. उसे चॉकलेट लेते समय समझाएं कि अगर हमारे पास दस रुपये हैं, तो हमें दस रुपये वाली ही चॉकलेट मिल सकती है. अगर हम पांच वाली लेते हैं तो पांच रुपये बच जाएंगे जिससे कल फिर एक चॉकलेट ली जा सकती है. जब वह कहे आपसे कि आपके पास और भी रुपये हैं, तब आप बच्चे को समझाइए कि बेटा और भी तो खर्च होते हैं.

ये बताने का यह मतलब नहीं कि आप उसको अपनी मजबूरी बता रहे हैं, ये बताकर आप उसे इस बात के लिए तैयार कर रहे हैं कि हमें खर्च संभलकर करना चाहिए. जब पहली बार उसे टॉफी या चॉकलेट दिलवाएं तो समझाकर ले जाएं कि अभी बताओ कि एक चॉकलेट या दो टॉफी, क्या चाहिए ? दुकान पर जाकर जिद नहीं करना. अगर जिद की तो एक भी नहीं मिलेगी, क्योंकि दुकान वाले अंकल भी कहेंगे कि कितना गंदा, जिद्दी बच्चा है.

पापा-मम्मा की बात नहीं मानता. जब वह अंकल मेरे प्यारे बच्चे के लिए ऐसा कहेंगे तो आपके पापा को क्या अच्छा लगेगा? नहीं न? सच में आपके पापा-मम्मा को बहुत खराब लगेगा. घर में दादी को भी दुख होगा कि वह दुकान वाले अंकल हमारे प्यारे बच्चे के लिए ऐसा कह रहे थे. क्या आपको अच्छा लगेगा कि आपके पापा, मम्मा, चाचा, दीदी, भइया दुखी हों ?

अगर आप एक, डेढ़-दो साल के बच्चे को मार्केट ले जाती हैं और वह वहां किसी खिलौने या टॉफी की डिमांड करता है, तो एक टॉफी ही दीजिए. यह नहीं कि वह जिद करे कि 10 चाहिए तो उतने ही दिलवाएं. बात कम या ज्यादा खर्च की भी नहीं. बात केवल आंख मूंदकर बच्चे की सारी डिमांड पूरी करके उसकी आदत बिगाड़ने की है.

एक-दो बार आपने उसे टॉफी-चॉकलेट दिला ही, फिर हर बार वह जिद करेगा और अगर आपने उसकी बात नहीं मानी, तो वह बाजार में ही रोयेगा, चिल्लायेगा. आपने उसकी बात मान ली, तो वह हर बार यही करेगा. अगर बात नहीं मानी तो घर आकर भी रोता रहेगा. घर में मां का मन पिघल जायेगा, बड़े-बुजुर्ग हुए तो उनका मन पिघल जायेगा. हो सकता है कि आपको ही डांट पड़ जाये, मगर उसकी फरमाइश पूरी हो जायेगी. यह उस बच्चे के लिए अच्छा नहीं होगा.

ऐसे में माता-पिता दोनों को ही थोड़ा सख्त होना होगा. छोटा बच्चा ये सारी बातें समझ जायेगा कि इस तरह की जिद पूरी नहीं होगी. आप यह भी कह सकते हैं कि जिद की तो एक भी खिलौना या उसकी मनपसंद चीज नहीं मिलेगी. अगर जिद नहीं की तो मम्मा आपकी बात मान ले या हो सकता है आपको दो चीजें मिल जाएं.

धीरे-धीरे बच्चा इन बातों में ढल जायेगा. अगर आपने एक बार जिद पूरी की तो उसे लगेगा कि रोने से, चिल्लाने से हमारी बात मान ली जायेगी और हर बार वह यही करेगा. कहीं किसी के सामने आपने ये कहा ऐसे मत रो, लोग देखेंगे क्या कहेंगे तो आप अनजाने में ही ‘चार लोगों की सोच’ उसके दिमाग में बैठा देंगे. वह कभी ‘इन चार’ के बारे में नहीं जान पायेगा मगर आप उसको ये डर दे जायेंगे. उसे डर नहीं दीजिए, बल्कि समझाइए.

ये इमोशन्स हैं. घर के प्रति प्यार और सम्मान की भावनाओं से जोड़ने का तरीका है. घर किसी एक से नहीं और एक का नहीं होता. घर सबका बराबर से होता है. घर में सभी व्यक्तियों की भावनाओं का सम्मान होना चाहिए.

क्रमश:

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