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Home Business मोदी-मनमोहन ही नहीं वाजपेयी को भी भाते थे रघुराम राजन, क्यों जरूरी है रिजर्व बैंक में उनकी दूसरी पारी?

मोदी-मनमोहन ही नहीं वाजपेयी को भी भाते थे रघुराम राजन, क्यों जरूरी है रिजर्व बैंक में उनकी दूसरी पारी?

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मोदी-मनमोहन ही नहीं वाजपेयी को भी भाते थे रघुराम राजन, क्यों जरूरी है रिजर्व बैंक में उनकी दूसरी पारी?

बिजनेस डेस्क


रघुराम राजन इन दिनों फिर सुर्खियों में हैं. अपने सटीक बयानों और प्रोफेशनल अंदाज के लिए मशहूर राजन का कार्यकाल पूरा हो रहा है. अंदरखाने से खबर आ रही है कि रघुराम राजन वापस अमेरिका जाकर रिसर्च करना चाहते हैं वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व वित्त मंत्री अरुण जेटली उनके दूसरे कार्यकाल के पक्ष में हैं, लेकिन सवाल यह है कि देश में इससे पहले भी रिजर्व बैंक के कई गर्वनर रहे हैं लेकिन राजनके इतना लोकप्रिय व चर्चा में कोई गवर्नर नहीं रहा. राजन को भले ही आज भाजपा नेताओं का एक वर्ग नापसंद करता हो, लेकिन उसी भाजपा के एक नेताओं का वर्ग उन्हें पसंद करता है. एक बिजनेस न्यूज एजेंसी केअनुसार,पीएमनरेंद्र मोदी पूर्व मेंहिदायत दे चुके हैंकिराजनकीआलोचना न हो.पीएमकामकाजके प्रति उनके प्रोफेशनल अंदाज से संतुष्ट हैं और दूसरी पारी देने पर विचार कर सकते हैं. समाचार एजेंसी पीटीआइनेखबर दी हैकिसरकारने अभी राजनकीदूसरी पारी परफैसला नहीं लिया है. पिछले दिनों प्रधानमंत्रीनरेंद्र मोदी ने भी अमेरिकी अखबार को दिये इंटरव्यू में कहा था कि रघुराम राजन को दूसरी पारी देना प्रशासनिक विषय है और इसमें मीडिया को रुचि नहीं लेनी चाहिए. उधर, सरकार के एक प्रमुख नौकरशाह ने राजन के पक्ष में बयान दिया है और कहा है कि उनको दोबारा गवर्नर पद मिलना आर्थिक हित में होगा.

रघुराम राजन की उपलब्धियां


रिजर्व बैंक के गर्वनर रघुराम राजन को केंद्रीय बैंक सर्वश्रेष्ठ गवर्नर पुरस्कार से भी नवाजा गया है. यह पुरस्कार रघुराम राजन को भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए कठोर मौद्रिक उपाय करने के लिए दिया गया. उन्होंने दुनिया भरकी अर्थव्यवस्था में अस्थिरता के बीच भारतीय मुद्रा रुपया को ढहने से बचाया. यही नहीं महंगाई दर में काबू पाकर आम आदमी को राहत देने की कोशिश की. इससे पहले आमतौर पर रिजर्व बैंककाॅरपोरेट केदबाव में आकर ब्याज दरों में कटौती कर दिया करते थे, लेकिन राजन ने रिजर्व बैंक के कामकाज को प्रोफेशनल अंदाज दिया और ब्याज दरों में कटौती तार्किक रूप से की न कि दबाव में. उन्होंने कई छोटे बैंकों को लाइसेंस जारी किया.

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बैंकों के एनपीए व क्रोनी कैपिटलिज्म निशाने पर


बैंकों के बढ़ते एनपीए पर राजन ने शख्त तेवर दिखाये और उसके कामकाज को पारदर्शी बनाया. उन्होंने कड़ाई से बैंकों से उनके एनपीए का हिसाब मांगा और उस पर लगाम कसने को कहा. पहले से घोटाले और क्रोनी कैप्टलिज्म का आरोप झेल चुके भारतीय बैंकिग व्यवस्था के लिए बेहद अहम सुधार माना जाता है. देश के दूर-दराज इलाकों में बैकिंग सुविधा नहीं होने के वजह से छोटे बैंकों का लाइसेंस देना बैंकिग सुधार में क्रांतिकारी कदम था.


दबाव में नहीं आते हैं राजन


अर्थशास्त्रियों की माने तो राजन को रिजर्व बैंक के गर्वनर के रूप में विस्तार मिलना देश की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है. वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर उनकी समझ बेहद गहरी है. मोदी सरकार ने कई आर्थिक सुधारों की घोषणा की है. देश की अर्थव्यवस्था को तेजी से दौड़ाने के लिए रिजर्व बैंक में एक ऐसे शख्स की जरूरत है जो बैंकिग सुधार में तेजी लाये. मजबूत मौद्रिक नीति और बैकिंग व्यवस्था से आम लोगों को लाभान्वित किया जा सकता है. यही नहीं राजन कभी दवाब में नहीं आते हैं. इनका साफगोई और बेबाक अंदाज उन्हें और लोकप्रिय बना देता है.

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नीतियों में एकरूपता


आर्थिक जगत के दिग्गजों की इस बात की चिंता है कि रघुराम राजन को वैसे वक्त में जब देश की अर्थव्यवस्था पुन: पटरी पर आ रही हो, तब हटाना नुकसानदेह होगा. उनको गवर्नर के रूप में दूसरी पारी मिलने से पॉलिसी में एकरूपता रहेगी और आर्थिक जगह संदेह व संशय में जाने से बच जायेगा. अगर किसी नये शख्स को इस पद पर लाया जायेगा तो संभव है वह नहीं पॉलिसी लागू करे. रायटर्स की एक खबर के अनुसार, सिर्फ उनकी दूसरी पारी पर अटकलों से बाजार में रुपये की स्थिति में गिरावट आयी. विदेशी निवेशक भी इस बात को लेकर संशय में हैं कि राजन को दूसरी पार मिलती है या नहीं. एसोचेम कहा चुका है कि राजनेता राजन पर टिप्पणी नहीं करे. उद्योग जगतचाहताहै कि राजन का नाम बेवजह विवाद में नहींखींचा जाये.


राजन के बारे में यह भी जानिए


वाजपेयी की भी थी उनमें रुचि


रघुराम राजन को भले ही देश पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह अपने कार्यकाल में 2012 में लेकर आये हों. लेकिन, मेधा, दृष्टि की स्पष्टता व ठोस निर्णय लेने की क्षमता वाले रघुराम राजन पर डॉ सिंह के पूर्व वाजपेयी की भी नजर थी. एनडीए शासन काल में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी रघुराम राजन की प्रतिभा का देश में उपयोग करना चाहते थे और उनकी यह सोच उनके करीबी व वरिष्ठ कैबिनेट सहयोगी तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस के सलाह पर बनी थी. पर, 2004 में वाजपेयी लोकसभा चुनाव हार गये और उनका इराधा धरा रह गया. अगर वाजपेयी उस चुनाव में जीत गये होते तो राजन बहुत पहले ही देश आ गये होते.


IIT व IIM से कर चुके हैं पढ़ाई


राजन का जन्‍म 3 फरवरी 1964 में मध्‍यप्रदेश के भोपाल में एक तमिल परिवार में हुआ था. रघुराम राजन ने सन 1985 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली से इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की. उन्होंने इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद से वर्ष 1987 में एमबीए किया. मैसाचुसेट्स इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से 1991 में अर्थशास्त्र में पीएचडी की उपाधि हासिल की. रघुराम राजन शिकागो यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके हैं. सितंबर 2003 से जनवरी 2007 तक वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में आर्थिक सलाहकार और अनुसंधान निदेशक रहे. 2008 में वे प्रधानमंत्रीडॉ मनमोहनसिंह के आर्थिक सलाहकार नियुक्‍त हुए और उसी साल उनकी अध्‍यक्षता में आर्थिक सुधार में हाई लेवल कमेटी की बैठक हुई जिसकी अंतिम रिपोर्ट प्‍लानिंग कमिशन को सौंपी गयी.

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