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ILO ने भारत से की पारिश्रमिक कानूनों के कड़ाई से पालन कराने की अपील

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ILO ने भारत से की पारिश्रमिक कानूनों के कड़ाई से पालन कराने की अपील

नयी दिल्ली : अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) ने देश में पारिश्रमिक कानूनों के कड़ाई से पालन का आह्वान किया है. विशेषकर महिलाओं के मामले में कम वेतन और असमानता को लेकर बनी चिंताओं के बीच आईएलओ की यह टिप्पणी आयी है. संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में ग्रामीण क्षेत्र में काम करने वाली अस्थायी महिला श्रमिकों को सबसे कम पारिश्रमिक मिलता है. यह शहर में काम करने वाले किसी पुरुष श्रमिक के पारिश्रमिक का 22 फीसदी ही है.

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आईएलओ की भारत पारिश्रमिक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दो दशक में देश की आर्थिक वृद्धि दर औसतन सात फीसदी रही है, लेकिन कम वेतन और असमानता भी बनी हुई है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत की आर्थिक वृद्धि से गरीबी में कमी आयी है. उद्योग और सेवा क्षेत्र में कामगारों की बढ़ती संख्या के साथ रोजगार के तरीकों में परिवर्तन आया है. हालांकि, लगभग 47 फीसदी लोग अब भी रोजी-रोजगार के लिए कृषि क्षेत्र में में लगे हुए हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में अभी भी बहुत सा व्यवसाय असंगठित तरीके से होता है और बाजार में विभाजन है.

रिपोर्ट में 2011-12 के आंकड़ों के अनुसार, बताया गया है कि देश में स्वरोजगार में लगे लोगों की का अनुपात 51 फीसदी है. वहीं, मजदूरी करने वाले 62 फीसदी व्यक्ति अस्थायी तौर पर काम करते हैं. हालांकि, औपचारिक क्षेत्र में रोजगार बढ़ा है, लेकिन इस क्षेत्र में भी अधिकतर नौकरियां अनौपचारिक प्रकृति की या अस्थायी हैं.

हालांकि, देश में पारिश्रमिक में असमानता 2004-05 के बाद से कम हुई है, लेकिन यह अभी भी बहुत ऊंचे स्तर पर है. पारिश्रमिक में असमानता के कम होने की प्रमुख वजह ठेके या अस्थायी तौर पर काम करने वालों की मजदूरी को 1993-94 और 2011-12 में दोगुना करना है. वहीं, नियमित रोजगार प्राप्त लोगों के मेहनताने में 1993-94 से 2004-05 के बीच आयी तीव्र असमानता 2011-12 में स्थिर हुई.

मेहनताने में समानता के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि लैंगिक आधार पर पारिश्रमिक में अंतर अभी भी बहुत गहरा है. अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप 1993-94 के 48 फीसदी से घटकर यह 2011-12 में 34 फीसदी पर आ गया है. पारिश्रमिक में अंतर हर क्षेत्र में और हर तरह के श्रमिकों के बीच बना हुआ है, चाहे वह अस्थायी हो या स्थायी. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अस्थायी तौर पर काम करने वाली महिला श्रमिक को देश में सबसे कम मेहनताना मिलता है.

भारत दुनिया के उन पहले देशों में से एक है, जिसने न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित की थी. इसके लिए 1948 में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम लागू किया गया था, लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी प्रकार के श्रमिकों के लिए न्यूनतम पारिश्रमिक लागू करना चुनौती बना हुआ है. अध्ययन में पाया गया है कि देश में न्यूनतम मजदूरी की प्रणाली काफी जटिल है. इसे रोजगार श्रेणियों के आधार पर राज्य सरकारें तय करती हैं. इस प्रकार देश में न्यूनतम पारिश्रमिक की 1709 विभिन्न दरें हैं. इन दरों के दायरे में केवल 66 फीसदी श्रमिक ही आते हैं.

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