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बस विश्वास रखें कि अपने भी जीवन में आएंगे खुशियों के पल

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बस विश्वास रखें कि अपने भी जीवन में आएंगे खुशियों के पल

एशियन गेम्स तीरंदाजी में सिल्वर मेडल विजेता मधुमिता की कहानी उसी की जुबानी

विजय बहादुर

vijay@prabhatkhabar.in

www.facebook.com/vijaybahadurranchi/

twitter.com/vb_ranbpositive

मधुमिता ने जकार्ता एशियाड में सिल्वर मेडल जीतकर झारखंड का नाम ही रोशन नहीं किया है, बल्कि उसने यह साबित कर दिया है कि हर स्थिति-परिस्थिति में आत्मविश्वास नहीं खोनेवाले को ही सफलता मिलती है. मधुमिता एक उम्मीद का नाम है. लगातार संघर्ष का नाम है मधुमिता. मधुमिता फर्श से उठ कर अर्श पर छा जाने का नाम है. इसी मधुमिता की जुबानी, उसकी कहानी सुनिए. जो बता रही है कि जब उसका विश्वास टूट जाता था, तो कैसे उसके कोच उसका आत्मविश्वास बढ़ाते थे.

जब मैं तीरंदाजी में आयी तब देखा कि यहां बहुत ही अच्छा माहौल था. यहां आकर लगा कि मैं भी तीरंदाजी में कुछ कर सकती हूं . देश के लिए कुछ किया जा सकता है. तभी से मैंने सोच लिया कि मुझे भी कुछ करना है. मेरे स्कूल की पढ़ाई रामगढ़ जिले के घाटो से हुई है, लेकिन मैंने मैट्रिक-इंटर की पढ़ाई सिल्ली के आरएस मुरी से की और तीरंदाजी की शुरुआत अपने स्कूल घाटो के समीप से की थी. मैं अपना आदर्श अपने कोच प्रकाश राम को मानती हूं. तीरंदाजी में मैंने जो कुछ भी सीखा, उन्हीं से सीखा. बाकी के तीरंदाज, जो वर्तमान में हैं, उनका हाव-भाव व काम करने के तरीके देखती हूं और सीखती हूं.

जब मेरा चयन जकार्ता के लिए हुआ, तो उस समय मैं सोच रही थी कि अब मेरी जिंदगी में वह समय आ चुका है, जब मुझे कुछ करके दिखाना चाहिए. देश के लिए एशियन गेम्स में मेडल लेकर आना है. मेरे शुभचिंतकों की शुभकामनाएं भी थीं कि मुझे मेडल लेकर आना है.

आज मेडल जीतने के बाद हर कोई मुझे बधाई दे रहा है और आगे जाने के लिए प्रेरित कर रहा है. लगता है कि मैं सातवें आसमान पर हूं. मैं इस पल को जीना चाहती हूं. संजो कर रखना चाहती हूं. हमेशा मेरी दुनिया ऐसी नहीं थी. कई बार मैं बहुत निराश हुई , ऐसा लगता था कि मुझे छोड़ देना चाहिए. लग रहा था कि मैं तीरंदाजी के पीछे समय बर्बाद कर रही हूं, लेकिन मेरे कोच का सपोर्ट हमेशा रहा. जब मैं निराश हो चुकी थी तो अपने कोच की वह बातें आज भी याद हैं. उन्होंने कहा था कि तू अच्छा करेगी. ऐसे हार मान कर नहीं जा सकती है.

इसी साल मैंने तीन वर्ल्ड कप खेला. तीनों में मेरा कुछ नहीं हुआ. मुझे बहुत बुरा लगा, लेकिन इसे सपोर्ट कहा जाये या फिर विश्वास. आज मैं कुछ पा सकी हूं. सफल होने के लिए, टॉप पर जाने के लिए जुनूनी होना जरूरी है. अपने काम पर ध्यान देना जरूरी है, तभी आप मुकाम पर पहुंच सकते हैं. जहां पहुंचना हर खिलाड़ी का सपना होता है.

जब मैंने तीरंदाजी ज्वाइन की, तभी मुझे नेशनल, इंटरनेशनल व मेडल के बारे में जानकारी हुई. उससे पहले तो मुझे कुछ भी पता नहीं था. उसके बाद मैं हर पल बस एक ही बात सोच रही थी कि मुझे देश के लिए मेडल लेकर एक दिन आना ही है. मैं मेडल ला सकती हूं. ये विश्वास पुख्ता होना शुरू हुआ. जब मेरा चयन भारतीय टीम में हुआ. वर्ष 2013 में मैं बहुत खुश थी कि मुझे भारतीय टीम के लिए खेलना है. मैं अपने कोच को बार-बार धन्यवाद बोलना चाहती हूं. ये सिर्फ उनका विश्वास था कि मैं कुछ कर सकती हूं.

मेरे आगे बढ़ने में सुदेश महतो (सर) का भी बहुत सहयोग रहा है. शायद उनके सपोर्ट के बिना कुछ कर पाना संभव नहीं था. जब भी मैं हारती-निराश हो जाती थी. मेरे पापा-मम्मी बोलते थे कि जब तक तुमको सफलता न मिल जाये, तब तक तुम लगी रहो. मेरे एकेडमी के साथ-साथ राज्य व पूरे देश का सपोर्ट था. तभी जाकर मैं कुछ कर सकी हूं.

मुझे किताब पढ़ना, गाना सुनना और स्पाइसी खाना बहुत अच्छा लगता है. मेरा पसंदीदा गाना है ‘अपनी भी जिंदगी में खुशियों का पल आयेगा’. मैंने अपने जीवन में काफी बुरा वक्त भी देखा है. इसलिए मुझे ये गाना बहुत ही पसंद है.

आज मैं उस हर इंसान को, जो एक मुकाम हासिल करना चाहता है, उससे कहना चाहती हूं कि मन में विश्वास के साथ लगे रहें. उनके जीवन में भी खुशियों के पल जरूर आएंगे.

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