उसी दौरान हम अपने नजदीकी रिश्तेदार के घर गये थे. वहां रिश्तेदार ने कहा कि क्या आपको नहीं लगता कि आपके बच्चे को प्रॉब्लम है, लेकिन उनका लहजा थोड़ा अपमानित करनेवाला था. हमलोगों ने तत्काल उसका प्रतिरोध किया और कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं है. हमारा बेटा मैग्गी पसंद करता है, पहचानता है. मां-बाबा बोलता है. हां, थोड़ा ज्यादा चंचल जरूर है और बच्चे को तो चंचल होना ही चाहिए. उन्होंने कहा कि आज भले ही आपको मेरी बात अच्छी नहीं लग रही है, लेकिन एक महीने के अंदर आप लोगों को अपने बच्चे को दिखलाने मेंटल हॉस्पिटल जाना होगा. मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं उसी वक्त चौदहवीं मंजिल से कूद जाऊं.
मैंने अपनी टीजीटी की नौकरी छोड़ी और पति ( एयरफोर्स से रिटायर हो चुके थे) ने बच्चे की आगे की परवरिश के लिए रांची में रहने का निर्णय लिया. रांची में कुछ स्पेशल बच्चों के स्कूल भी गये, लेकिन ऐसा लगा कि शायद शुभ्रांशु का बेहतर तरीके से लर्निंग यहां नहीं हो पायेगा. उसके बाद शुभ्रांशु का नामांकन नॉर्मल बच्चों के स्कूल ईस्ट प्वाइंट में कराया. स्कूल में टीचर्स को कहा कि आप हमारे शुभ्रांशु को स्कूल में नॉर्मल बच्चों के साथ बैठने दें, बाकी उसे सिखाने की जिम्मेवारी घर पर हमारी है. क्लास तीन के बाद शुभ्रांशु का नामांकन तत्कालीन शिक्षा सचिव आराधना पटनायक के विशेष सहयोग से उत्क्रमित विद्यालय, अनगड़ा में हुआ और आज वो आठवीं कक्षा में पढ़ रहा है.
