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… जादूगोड़ा डूब रहा है, बचा लो

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… जादूगोड़ा डूब रहा है, बचा लो

वीरेंद्र कुमार सिंह

झारखंड के जादूगोड़ा निवासी आशीष बिरूली की फोटो प्रदर्शनी 28 से 31 मार्च तक जापान के क्योटो शहर में लगी. इस फोटो प्रदर्शनी की चर्चा न केवल जापान में बल्कि भारत में भी जोर-शोर से हुई. इस चार दिवसीय इंटरनेशनल यूथ कॉन्फ्रेंस क्यूटो में वर्ल्ड न्यूक्लियर विक्टिम फोरम पर आयोजित सेमिनार के दौरान फोटो प्रदर्शनी लगायी गयी. फोटो तो केवल देखने की चीज होती है, लेकिन यह फोटो मूक के समान होते हुए भी आपके दिलो-दिमाग पर गहरी छाप छोड़ती है. आशीष बिरूली ने भी खींची गयी तसवीरों के माध्यम से यूरेनियम के विकिरण के कारण बच्चों के नारकीय जीवन का सजीव चित्रण किया है.

यूरेनियम की विभीषिका को देख प्रदर्शनी देखने आये लोगों के आंखों में आंसू भर आये. प्रदर्शनी के माध्यम से आशीष ने दिखाया कि यूरेनियम के विकिरण से बच्चे कैसे अपाहिज पैदा हो रहे हैं तथा परिवार के लोग किस तरह जिंदगी जीने को मजबूर हैं. जहां भी यह प्लांट है, वहां के लोग यूरेनियम के विकिरण युक्त पानी, हवा, भोजन लेने को अभिशप्त हो गये हैं. इसका असर उन्हें रोजाना देखने को मिल रहा है. इसके बावजूद इनलोगों की जिंदगी पर किसी का ध्यान नहीं गया. आशीष की यह फोटो प्रदर्शनी केवल जापान में ही नहीं, उससे पहले ब्राजील और कनाडा में भी प्रदर्शित हो चुकी है.

जादूगोड़ा उनू मो ताना यानी जादूगोड़ा डूब रहा, उसे बचाएं : आशीष बिरूली : फोटोग्राफर आशीष बिरुली संताली में कहते हैं कि जादूगोड़ा उनू मो ताना यानी जादूगोड़ा डूब रहा है. न केवल जादूगोड़ा, बल्कि विश्व में जहां भी न्यूक्लियर प्रोजेक्ट लगे हैं, वहां के लोगों की हालत बद-से-बदतर है. आज हर देश में परमाणु शक्ति बढ़ाने की होड़ मची है. एक ओर कोई भी देश अपने को गौरवान्वित महसूस करता है, तो वहीं दूसरी ओर इसका पर्यावरण पर खतरनाक असर भी पड़ता है. जापान के हिरोशिमा एवं फूकूसीमा, रूस का चर्नोबील, यूएसए के थीर माइल आइलैंड इसका जीता जागता उदाहरण है.

कौन है आशीष बिरूली

पूर्वी सिंहभूम जिलांतर्गत जादूगोड़ा के निवासी घनश्याम बिरूली के पुत्र हैं आशीष बिरूली. छात्र जीवन से ही फोटोग्राफी उनके जेहन में रचा-बसा है. जादूगोड़ा में यूरेनियम से प्रभावित लोगों को देख कर इनका मन हमेशा दुखी रहता था. तभी से इन्होंने यूरेनियम से ग्रसित लोगों की जीवनी को विश्व पटल पर रखने की ठानी. आशीष द्वारा खींची गयी तसवीर हर बार कुछ-न-कुछ संदेश जरूर छोड़ जाती है. आशीष बिरूली राज्य के ऐसे आदिवासी युवा हैं, जो मात्र 13 साल की उम्र में साल 2002 में पहली बार हिरोशिमा दिवस के अवसर पर जापान गये, जहां यूरेनियम से पीड़ित लोगों के निदान पर चर्चा होना था. 2015 में भी हिरोशिमा डे पर आयोजित सेमिनार में आशीष ने शिरकत की थी. 2017 में आशीष को एक बार फिर जापान जाने का मौका मिला और यह उनकी तीसरी यात्रा थी.

विकिरण से परेशान लोग : घनश्याम बिरुली

झारखंडी ऑर्गेनाइजेशन एगेंस्ट रेडिएशन नामक संगठन 1995 से घनश्याम बिरूली चलाते हैं. घनश्याम को वर्ष 2004 में न्यूक्लियर फ्यूचर अवाॅर्ड से जर्मनी में सम्मानित किया गया है. घनश्याम बिरूली भी यूरेनियम से निकले विकिरण द्वारा प्रभावित क्षेत्रों को फोकस करते हैं तथा उससे बचाव की लड़ाई लड़ रहे हैं. घनश्याम भी जापान, जर्मनी, अमेरिका, साउथ अफ्रीका आदि देशों का दौरा कर चुके हैं. घनश्याम कहते हैं कि विकिरण का प्रभाव बहुत ही खराब होता है. लोग घूट-घूट कर मरने को विवश होते हैं.

11 देशों के सैकड़ों युवाओं ने प्रदर्शनी में की शिरकत : क्यूटो में आयोजित इंटरनेशनल यूथ कॉन्फेंस में 11 देशों के युवाओं ने भाग लिया, जिसमें अमेरिका, जर्मनी, दक्षिणी कोरिया, ताइवान, जापान, हांगकांग, कांगो, आर्मेनिया, फिलीपिंस एवं बेलारूस के युवाओं ने भाग लिया. भारत से सिर्फ आशीष ने ही भाग लिया. इस कॉन्फेंस का मुख्य उद्देश्य था कि दुनिया भर के युवा एक साथ जमा होकर अपने अनुभवों को शेयर करें तथा उस पर विचार मंथन करे.

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